लैब में जानवरों पर होंगे खतरनाक प्रयोग? नए ड्राफ्ट पर बवाल, गौरी मौलेखी बोलीं- 'भारत बन जाएगा रिसर्च का डस्टबिन'
लैब में जानवरों पर प्रयोग से जुड़े नए सरकारी ड्राफ्ट पर पशु कल्याण कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि नए नियम जानवरों की सुरक्षा कमजोर कर भारत को रिसर्च का डस्टबिन बना सकते हैं।
नई दिल्ली: पीपल फॉर एनिमल्स की ट्रस्टी और पशु कल्याण कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने प्रयोगशालाओं में जानवरों के इस्तेमाल से जुड़े भारत सरकार के नए ड्राफ्ट नियमों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इंडिया टीवी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने चेतावनी दी कि प्रस्तावित बदलाव जानवरों की सुरक्षा के लिए मौजूद व्यवस्थाओं को कमजोर कर सकते हैं। उनके मुताबिक, इन नियमों का असर सिर्फ बेजुबान जानवरों की जिंदगी और उनकी पीड़ा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैज्ञानिक शोध की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है। जानवर अपनी तकलीफ बयां नहीं कर सकते, लेकिन उनकी पीड़ा को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
'ड्राफ्ट में मौजूद प्रावधान मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करेंगे'
गौरी मौलेखी ने कहा कि पशु कल्याण से जुड़े कानूनों पर करीब 30 साल काम करने के बाद उन्हें यह ड्राफ्ट बेहद चिंताजनक लगा। उनके मुताबिक, इसके दो कारण हो सकते हैं। या तो इसे तैयार करने वालों को मौजूदा कानून और उसके प्रावधानों की समझ नहीं है या फिर कुछ उद्योगों को फायदा पहुंचाने के लिए जानबूझकर ऐसे नियम बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि ये नियम सिर्फ जानवरों को प्रभावित नहीं करेंगे, बल्कि उद्योग, विज्ञान और आम जनता पर भी असर डालेंगे। मौलेखी के मुताबिक, पहले से मौजूद सुरक्षा व्यवस्थाओं को कमजोर करने के बजाय और मजबूत किया जाना चाहिए था।
लैब खुद तय करेंगी कि किस प्रयोग के लिए मंजूरी जरूरी है
गौरी मौलेखी ने पूरे ड्राफ्ट का सबसे खतरनाक प्रावधान बताते हुए कहा कि इसमें प्रयोगशालाओं को खुद तय करने की छूट दी जा रही है कि किस प्रयोग के लिए सरकारी मंजूरी लेनी है और किसके लिए नहीं। किसी प्रयोग से होने वाले दर्द को कम या ज्यादा बताने का फैसला भी संस्थान खुद कर सकेंगे। उन्होंने इसे हितों के टकराव का मामला बताया। उनके मुताबिक, 6 सदस्यों की समिति में 4 सदस्य उसी संस्थान के होंगे और 2 बाहर के। ऐसे में संस्थान के सदस्य किसी फैसले को अपने पक्ष में कर सकते हैं। इससे स्वतंत्र निगरानी कमजोर होगी।
जानवरों पर प्रयोग से पहले कई सवालों की जांच जरूरी
मौलेखी ने समझाया कि किसी भी प्रयोग के लिए एक प्रोटोकॉल तैयार किया जाता है। इसमें बताया जाता है कि कितने जानवरों की जरूरत होगी, उन पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, कौन सी दवा दी जाएगी और प्रयोग का वैज्ञानिक आधार क्या है। इसके बाद जांच होती है कि क्या जानवरों के बिना कोई दूसरा तरीका अपनाया जा सकता है। क्या कम जानवरों से काम चल सकता है और क्या प्रस्तावित प्रयोग वास्तव में जरूरी है। पहले इन पहलुओं की जांच सरकारी निगरानी वाली व्यवस्था के तहत होती थी। लेकिन नए ड्राफ्ट में कम दर्द वाले प्रयोगों को संस्थान खुद मंजूरी दे सकेंगे।
खुले बाजार से जानवर खरीदने और जंगली जीवों को पकड़ने पर चिंता
ड्राफ्ट में यह प्रावधान भी बताया गया है कि अगर रजिस्टर्ड ब्रीडर्स से जानवर उपलब्ध नहीं होते तो प्रयोगशालाएं कुछ फार्म एनिमल्स, पक्षियों और मछलियों को खुले बाजार से खरीद सकती हैं। मौलेखी ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे आसपास के इलाकों के कुत्तों, बंदरों और गाय-बैलों को भी प्रयोगों के लिए उठाए जाने का खतरा है। उन्होंने बताया कि सड़क या जंगल से लाए गए जानवरों की पुरानी बीमारियां और उनके शरीर में मौजूद संक्रमण प्रयोग के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इससे गलत आंकड़ों के आधार पर दवाएं तैयार होने का खतरा भी रहेगा।
जानवरों के दर्द और तकलीफ को नजरअंदाज करने का आरोप
गौरी मौलेखी ने कहा कि प्रयोगशालाओं में जानवरों को बेहद दर्दनाक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि हड्डियों से जुड़ी दवाओं की जांच के लिए खरगोशों की हड्डियां तोड़ी जा सकती हैं। टॉक्सिसिटी जांच में जानवरों को इतनी मात्रा में दवा दी जाती है कि आधे जानवरों की मौत हो जाए। इसे एलडी-50 टेस्ट कहा जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि त्वचा की जलन जांचने के लिए खरगोशों की आंखों में दवाएं डाली जाती हैं। यहां तक कि हेलमेट की जांच के लिए बंदरों को जिंदा और होश में रखकर उनके सिर पर दबाव डाला जाता है।
एक जानवर पर 5 साल तक बार-बार किए जा सकते हैं प्रयोग
मौलेखी के मुताबिक, नए नियमों के तहत एक जानवर पर पांच साल तक बार-बार प्रयोग किए जा सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि पहले एनेस्थीसिया और दर्द कम करने वाली दवाओं का इस्तेमाल जरूरी था, लेकिन नए ड्राफ्ट में इस सुरक्षा को हटा दिया गया है। उन्होंने मानसिक पीड़ा का मुद्दा भी उठाया। उनके मुताबिक, जानवर सिर्फ शारीरिक दर्द ही नहीं, बल्कि डर, तनाव, अकेलापन और परिवार से अलग होने की तकलीफ भी महसूस करते हैं। लंबे समय तक भूखा रखना या प्राकृतिक व्यवहार से रोकना भी उनके लिए गंभीर पीड़ा है। इसे सिर्फ सुई चुभने वाले दर्द से नहीं मापा जा सकता।
अंतरराष्ट्रीय नियमों से किस तरह अलग हैं नए ड्राफ्ट के नियम?
अंतरराष्ट्रीय नियमों का जिक्र करते हुए मौलेखी ने यूरोपीय संघ के वर्ष 2010 के कानून का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि वहां किसी भी प्रयोग से पहले यह साबित करना होता है कि जानवरों के बिना काम क्यों नहीं हो सकता। कम जानवरों के इस्तेमाल और प्रयोग के बाद उनके पुनर्वास की व्यवस्था पर भी ध्यान दिया जाता है। इसके उलट, उनके मुताबिक भारत का नया ड्राफ्ट प्रयोगशालाओं को ज्यादा छूट देता है। उन्होंने आशंका जताई कि जिन प्रयोगों की दूसरे देशों में कड़ी जांच होती है, वे भारत में होने लगेंगे। उन्होंने इसे 'रिसर्च का डस्टबिन' और 'जानवरों का टॉर्चर चेंबर' बनने का खतरा बताया।
अचानक निरीक्षण की जगह पहले सूचना देने पर भी उठाए सवाल
मौलेखी ने कहा कि पहले प्रयोगशालाओं में अचानक निरीक्षण किया जा सकता था, लेकिन नए प्रावधानों के तहत पहले से सूचना देने की व्यवस्था निगरानी को कमजोर कर सकती है। उनका कहना है कि सूचना मिलने पर प्रयोगशालाएं गड़बड़ियां छिपा सकती हैं और जानवरों की खराब हालत या प्रयोग में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को हटा सकती हैं। उन्होंने अपने एक पुराने निरीक्षण का अनुभव भी साझा किया। उनके मुताबिक, एक बड़े मेडिकल कॉलेज की टॉक्सिकोलॉजी लैब में 27 बड़े सांप मरे हुए मिले थे, जिनमें एक करीब 19 फुट लंबी मादा किंग कोबरा भी थी। उन्होंने बताया कि इस मामले में संबंधित निगरानी समिति ने कार्रवाई की थी।
5 नवंबर से पहले सरकार को सुझाव और आपत्तियां भेजने की अपील
गौरी मौलेखी ने कहा कि भारत के पास दवा और रिसर्च के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने का अवसर है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सिमुलेशन और दूसरे विकल्पों की मदद से जानवरों पर प्रयोग कम किए जा सकते हैं। लेकिन कमजोर निगरानी के कारण देश वैज्ञानिक प्रगति में पीछे रह सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे 5 नवंबर से पहले सरकार को इस ड्राफ्ट पर अपने सुझाव और आपत्तियां भेजें। उनके मुताबिक, कानून बनाने से पहले वैज्ञानिकों, उद्योगों, पशु कल्याण संगठनों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और आम नागरिकों से सलाह लेना जरूरी है, ताकि अंतिम नियम देश को आगे ले जाएं, पीछे नहीं।
नोट: आप प्रस्तावित नियमों पर अपने सुझाव या आपत्तियां ईमेल के जरिए cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।
