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'बेजुबानों की बलि देकर किसका फायदा?' लैब टेस्टिंग के नए ड्राफ्ट पर अजय जो ने उठाए गंभीर सवाल

देश में प्रस्तावित Draft Laboratory Animals Rules 2026 को लेकर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है। India TV से खास बातचीत में पशु कार्यकर्ता और रेस्क्यूअर अजय जो ने ड्राफ्ट के कई प्रावधानों पर सवाल उठाए।

भारत सरकार ने लैबोरेटरीज में जानवरों के इस्तेमाल से जुड़े नियमों में बदलाव के लिए जिस ड्राफ्ट का प्रस्ताव रखा है, उसे लेकर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने गंभीर चिंताएं जताई हैं। उनका कहना है कि नए नियमों से लैबोरेटरीज में जानवरों के इस्तेमाल का दायरा बढ़ सकता है। प्रस्तावित बदलावों से जानवरों पर प्रयोग करना पहले के मुकाबले आसान हो सकता है। एनिमल एक्टिविस्ट और रेस्क्यूअर अजय जो ने इंडिया टीवी को दिए इंटरव्यू में कहा कि नए नियमों में निगरानी और जवाबदेही को लेकर कई सवाल हैं। उनका कहना है कि बेजुबान जानवर अपना दर्द बयां नहीं कर सकते। अजय का दावा है कि पहले जानवरों के इस्तेमाल को लेकर अपेक्षाकृत सख्त नियम थे, लेकिन नए प्रस्ताव में प्रयोगशालाओं को अपनी आंतरिक कमेटी बनाने और कई फैसले खुद लेने की अधिक गुंजाइश मिल सकती है।

अजय जो के मुताबिक पहले मुख्य रूप से छोटे जानवरों के इस्तेमाल पर जोर था, लेकिन नए प्रस्ताव में बड़े जानवरों और वन्यजीवों को भी शामिल किए जाने को लेकर चिंता है। अजय का कहना है कि इस बदलाव का सबसे बड़ा खतरा यह है कि जानवरों की खरीद और उपलब्धता का दायरा बढ़ सकता है। इससे उन लोगों और व्यापारियों को भी मौका मिल सकता है, जो जानवरों की ब्रीडिंग और खरीद-फरोख्त के कारोबार में शामिल हैं। हालांकि, इन सभी आशंकाओं को प्रस्तावित ड्राफ्ट के प्रावधानों के संदर्भ में देखना जरूरी है। किसी प्रस्ताव के दुरुपयोग की आशंका और उसका वास्तविक कानूनी प्रभाव अलग-अलग विषय हैं।

लैब के लिए जानवर कहां से आएंगे, खरीद-फरोख्त बढ़ने का डर

नए ड्राफ्ट को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में से एक लैबोरेटरीज के लिए जानवरों की उपलब्धता का तरीका है। एनिमल एक्टिविस्ट अजय जो के मुताबिक, अभी तक लैबोरेटरीज के लिए जानवर विशेष रूप से स्वीकृत ब्रीडिंग सेंटरों से लाए जाते हैं। इन केंद्रों में जानवरों की ब्रीडिंग और उपलब्धता के लिए एक निर्धारित व्यवस्था होती है। लेकिन प्रस्तावित बदलावों में कुछ परिस्थितियों में रजिस्टर्ड ब्रीडर्स से जानवर उपलब्ध नहीं होने पर फार्म एनिमल्स, पक्षियों और मछलियों को खुले बाजार से खरीदने की अनुमति का प्रावधान चर्चा में है।

अजय जो ने इस बात की आशंका जताई कि इसका फायदा उठाकर जानवरों की खरीद-फरोख्त करने वाले बिचौलिए सक्रिय हो सकते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पुरानी दिल्ली समेत कई जगहों पर रात के समय खरगोश और चूहे बिकते दिखाई देते हैं। यदि जानवरों की खरीद के लिए नियमों में ढील मिलती है तो इस तरह के कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है। उनका सवाल है कि प्रयोगशालाओं को कैसे पता चलेगा कि कोई ब्रीडर वास्तव में जानवरों की वैध ब्रीडिंग कर रहा है या फिर उन्हें सड़कों और दूसरी जगहों से पकड़कर ला रहा है?

यह चिंता केवल छोटे जानवरों तक सीमित नहीं है। अजय के मुताबिक, बड़े जानवरों को भी लैबोरेटरी में लाने की संभावनाओं से आवारा पशुओं, कुत्तों और बिल्लियों के साथ-साथ वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर सवाल पैदा होते हैं। उनका कहना है कि यदि जानवरों की उपलब्धता और स्रोत की निगरानी मजबूत नहीं हुई तो इसका दुरुपयोग हो सकता है।

लैब की अपनी कमेटी ही करेगी फैसले, निगरानी पर सवाल

इस नए ड्राफ्ट को लेकर दूसरी बड़ी आपत्ति लैबोरेटरीज की आंतरिक निगरानी व्यवस्था से जुड़ी है। अजय जो का कहना है कि अगर किसी लैबोरेटरी को अपनी कमेटी बनाने और उसी कमेटी के जरिए जानवरों पर होने वाले प्रयोगों से जुड़े फैसले लेने की अधिक छूट मिलती है तो निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। उनके मुताबिक, लैबोरेटरी के भीतर काम करने वाले लोग संस्थान के प्रबंधन और अधिकारियों के अधीन होते हैं। ऐसे में यह आशंका बनी रहती है कि कमेटी जानवरों के हितों के बजाय संस्थान की जरूरतों को प्राथमिकता दे सकती है।

इस सवाल पर कि अगर किसी लैब का निरीक्षण करने से पहले उसे सूचना दे दी जाएगी तो जांच कितनी प्रभावी रह पाएगी? अजय के मुताबिक, पहले से सूचना मिलने पर प्रयोगशाला अपने यहां की व्यवस्थाओं को निरीक्षण के अनुरूप दिखाने की तैयारी कर सकती है। ऐसे में जानवरों के रहने की वास्तविक परिस्थितियों, उनकी देखभाल और प्रयोगों के दौरान होने वाली तकलीफ का सही आकलन करना मुश्किल हो सकता है। अजय जो मानना है कि निरीक्षण की व्यवस्था स्वतंत्र और प्रभावी होनी चाहिए। केवल कागजों पर नियम बना देने से जानवरों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि किसी प्रयोगशाला में नियमों का उल्लंघन होता है तो उसकी पहचान कौन करेगा और जिम्मेदारी किसकी होगी?

जानवरों को एक्सपेरिमेंट्स के दौरान कितनी तकलीफ होती है?

लैबोरेटरीज में जानवरों पर किए जाने वाले परीक्षणों को लेकर सबसे संवेदनशील मुद्दा उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का है। अजय जो के मुताबिक, आम लोगों को यह जानकारी बहुत कम होती है कि लैबोरेटरीज में जानवरों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि कुछ प्रयोगों के दौरान जानवरों को बांधा जाता है, लटकाया जाता है और लंबे समय तक ऐसी परिस्थितियों में रखा जाता है, जिनसे उन्हें दर्द और तनाव का सामना करना पड़ सकता है।

उनका कहना है कि दवाइयों, केमिकल और कॉस्मेटिक्स से जुड़े परीक्षणों में भी जानवरों को इस्तेमाल किया जाता है। कुछ परीक्षणों में पदार्थों को जानवरों की आंखों और शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर लगाया जाता है। इस दौरान जानवरों को लंबे समय तक सीमित जगहों में रखा जा सकता है।

अजय ने सवाल उठाया कि जब कोई इंसान दर्द महसूस करता है तो वह अपनी तकलीफ बता सकता है, लेकिन जानवर अपनी परेशानी को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते। ऐसे में उनके दर्द को निर्धारित करने का अधिकार केवल प्रयोग करने वाले वैज्ञानिकों के पास होना कितना उचित है? उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रस्तावित नियमों में वैज्ञानिकों को यह निर्धारित करने की अधिक भूमिका मिल सकती है कि किसी प्रयोग में जानवर को कितना दर्द हो रहा है। उनके मुताबिक, जानवरों की तकलीफ को समझने के लिए उनकी शारीरिक प्रतिक्रियाओं और व्यवहार को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

माइल्ड, मॉडरेट और सीवियर दर्द की श्रेणियों पर सवाल

इस प्रस्तावित ड्राफ्ट में एक्सपेरिमेंट्स को माइल्ड, मॉडरेट और सीवियर जैसी श्रेणियों में बांटने का मुद्दा भी चर्चा में है। इस तरह के वर्गीकरण का उद्देश्य एक्सपेरिमेंट के दौरान जानवरों को होने वाली संभावित तकलीफ के स्तर को निर्धारित करना है। लेकिन पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का सवाल है कि आखिर दर्द की इन श्रेणियों का निर्धारण किस आधार पर किया जाएगा?

अजय जो का कहना है कि दर्द तो  होता है। किसी जानवर को इंजेक्शन लगाना हो, उसके शरीर में कोई ट्यूब डालनी हो या उसे जलने जैसी स्थिति से गुजरना पड़े, हर स्थिति में उसे शारीरिक परेशानी हो सकती है। अब सवाल यह है कि कोई साइंटिस्ट लैबोरेटरी में बैठकर कैसे तय कर सकता है कि किसी जानवर के लिए दर्द माइल्ड है या मॉडरेट?

उनके मुताबिक, जानवरों के दर्द को केवल वैज्ञानिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया में जानवरों के व्यवहार और उनकी वास्तविक तकलीफ को भी महत्व मिलना चाहिए। अजय का मानना है कि विज्ञान का इस्तेमाल जानवरों पर प्रयोग बढ़ाने के बजाय ऐसे विकल्प विकसित करने के लिए होना चाहिए, जिनसे परीक्षणों में जानवरों की जरूरत ही खत्म हो जाए।

एक्सपेरिमेंट्स के बाद जानवरों का क्या होगा?

जानवरों पर एक्सपेरिमेंट खत्म होने के बाद उनकी देखभाल का मुद्दा भी इस विवाद का एक अहम हिस्सा है। अजय के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में प्रयोग के बाद जानवरों की जीवनभर देखभाल करने का प्रावधान है। उनका कहना है कि जिन जानवरों को वैज्ञानिक परीक्षणों के दौरान दर्द और परेशानी से गुजरना पड़ा है, उनकी जिम्मेदारी प्रयोगशाला को उठानी चाहिए।

लेकिन नए प्रस्तावित नियमों में एक्सपेरिमेंट के बाद जानवरों को दोबारा इस्तेमाल करने या इच्छामृत्यु यानी यूथेनेशिया देने की संभावनाओं को लेकर उन्होंने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यदि किसी जानवर पर एक बार प्रयोग हो चुका है तो उसे दोबारा परीक्षण में इस्तेमाल करने से पहले उसकी स्थिति और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

जानवरों की देखभाल का खर्च बचाने के लिए उन्हें इच्छामृत्यु देने के विकल्प पर अजय जो ने कहा कि अगर किसी जानवर को एक्सपेरिमेंट के बाद स्वस्थ जीवन दिया जा सकता है तो उसे जीवनभर देखभाल उपलब्ध करानी चाहिए या फिर उसे गोद लेने की व्यवस्था करनी चाहिए। उनका मानना है कि किसी जानवर को प्रयोग में इस्तेमाल करने के बाद उसकी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

क्या जानवरों की मानसिक सेहत का भी रखा जाता है ध्यान?

लैबोरेटरीज में जानवरों की सुरक्षा की चर्चा अक्सर उनके शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित रह जाती है। लेकिन पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही गंभीरता से समझने की जरूरत है। अजय जो के मुताबिक, जानवरों में भी डर, तनाव, अकेलापन और मानसिक आघात जैसी स्थितियां हो सकती हैं। लंबे समय तक एक सीमित जगह में रहना, दूसरे जानवरों से अलग रहना और लगातार प्रयोगों का सामना करना उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि जानवरों की भावनाओं को समझने की दिशा में समाज ने पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई है।

अजय जो के मुताबिक किसी भी जानवर के लिए रहने की जगह, दूसरे जानवरों का साथ, खानपान और नियमित देखभाल बेहद जरूरी है। उन्होंने गौशालाओं और डॉग शेल्टर का उदाहरण देते हुए कहा कि कई जगहों पर जानवरों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता, ओवरक्राउडिंग होती है और उनकी मौत तक हो जाती है। अजय का कहना है कि केवल नियम बनाने से पशु कल्याण सुनिश्चित नहीं हो सकता। इसके लिए लगातार निगरानी और जवाबदेही जरूरी है।

कॉस्मेटिक्स टेस्टिंग पर पहले से प्रतिबंध, फिर भी चिंता क्यों?

भारत में कॉस्मेटिक्स के टेस्टिंग के लिए जानवरों के इस्तेमाल पर पहले से प्रतिबंध है। इस दिशा में 2014 में महत्वपूर्ण फैसला लिया गया था। यूरोपीय संघ में भी कॉस्मेटिक्स के लिए जानवरों पर परीक्षण को प्रतिबंधित किया गया है। इसके बावजूद नए ड्राफ्ट को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या लैबोरेटरीज में जानवरों के इस्तेमाल से संबंधित नियमों में बदलाव का किसी तरह दुरुपयोग हो सकता है?

अजय जो का कहना है कि कॉस्मेटिक्स के क्षेत्र में प्रतिबंध होने के बावजूद यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि नियमों का उल्लंघन न हो। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के बद्दी इंडस्ट्रीयल एरिया का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक, वहां बड़ी संख्या में फार्मा कंपनियां हैं और औद्योगिक कचरे के निपटान को लेकर भी गंभीर सवाल हैं। उन्होंने घग्गर नदी की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि औद्योगिक और मेडिकल वेस्ट के कारण पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। उनका कहना है कि जब मौजूदा नियमों का पालन सुनिश्चित करना ही एक चुनौती है तो नए नियमों में ढील देने से जानवरों और पर्यावरण दोनों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

हालांकि, कॉस्मेटिक्स टेस्टिंग पर पहले से लागू प्रतिबंध और दवाइयों या अन्य वैज्ञानिक अनुसंधान में जानवरों के इस्तेमाल से जुड़े नियम अलग-अलग विषय हैं। इन्हें एक-दूसरे के समान नहीं समझना चाहिए।

जानवरों पर प्रयोग के विकल्प बन सकता है AI और रोबोटिक्स?

जानवरों पर टेस्टिंग के खिलाफ अपनी दलील रखते हुए अजय ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स को भविष्य का महत्वपूर्ण विकल्प बताया। उनका कहना है कि विज्ञान और तकनीक में तेजी से बदलाव हो रहा है। ऐसे में भारत को भी जानवरों पर प्रयोग की निर्भरता कम करने के लिए नई तकनीक विकसित करनी चाहिए। अजय के मुताबिक, AI की मदद से कई तरह के वैज्ञानिक परीक्षणों और शोध प्रक्रियाओं में बदलाव लाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूरोप जैसे क्षेत्र इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने भी 2035 तक केमिकल टेस्टिंग में स्तनधारी जानवरों के इस्तेमाल को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। अजय का मानना है कि AI और रोबोटिक्स की प्रगति को देखते हुए भारत को 2035 तक इंतजार करने के बजाय अभी से इस दिशा में काम शुरू कर देना चाहिए। अजय जो का कहना है कि भारत को केवल दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय अपनी तकनीक और स्टार्टअप विकसित करने चाहिए। हालांकि, AI और कंप्यूटर आधारित मॉडल सभी तरह के जैविक परीक्षणों का तत्काल विकल्प नहीं हैं। इसके लिए वैज्ञानिक प्रमाण, तकनीकी विकास और नियामकीय मंजूरी भी जरूरी है।

एनिमल टेस्टिंग में 90-95 फीसदी फेल होने का दावा

अजय जो का दावा है कि जानवरों पर सफल रहने वाले कई टेस्टिंग जब इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल के चरण में पहुंचते हैं तो उनमें से 90 से 95 फीसदी से ज्यादा असफल हो जाते हैं। अजय जो के मुताबिक, जानवरों और इंसानों के शरीर की जैविक संरचना में अंतर होने के कारण किसी दवा का जानवरों पर सफल होना यह गारंटी नहीं देता कि वह इंसानों पर भी उतनी ही प्रभावी होगी। इसलिए उनका मानना है कि वैज्ञानिक अनुसंधान में ऐसे तरीकों को बढ़ावा देना चाहिए, जिनसे इंसानों पर दवाओं के प्रभाव का अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सके। इसमें कंप्यूटर मॉडलिंग, सेल कल्चर और अन्य नॉन-एनिमल टेस्टिंग तकनीकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

भारत में नॉन-एनिमल टेस्टिंग को बढ़ावा देने की जरूरत

अजय जो का कहना है कि भारत को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अपनी क्षमता का इस्तेमाल करते हुए जानवरों पर प्रयोग कम करने की दिशा में काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की वैज्ञानिक और चिकित्सा परंपरा काफी पुरानी है। सम्राट अशोक के समय पशुओं के लिए अस्पतालों की व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है। उनके मुताबिक, भारत को अपनी इसी परंपरा से प्रेरणा लेकर पशु कल्याण और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन बनाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि नॉन-एनिमल टेस्टिंग को बढ़ावा देने में सबसे बड़ी बाधा केवल तकनीक या निवेश की कमी नहीं, बल्कि सोच में बदलाव की कमी भी है। उनका मानना है कि फार्मा कंपनियों, वैज्ञानिकों और सरकारी अधिकारियों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि किसी प्रयोग के लिए वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित वैकल्पिक तरीका उपलब्ध है तो जानवरों के इस्तेमाल के बजाय उसी विकल्प को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

आम पब्लिक 5 नवंबर से पहले भेजे सुझाव

इस पूरे विवाद में आम लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। अजय जो ने लोगों से अपील की कि वे प्रस्तावित ड्राफ्ट को पढ़ें और 5 नवंबर से पहले सरकार को अपने सुझाव और आपत्तियां भेजें। उनका कहना है कि पशु अधिकारों की रक्षा केवल सरकार या पशु कल्याण संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है। आम नागरिक भी इस दिशा में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

नोट: आप प्रस्तावित नियमों पर अपने सुझाव या आपत्तियां ईमेल के जरिए cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।

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