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'पशुओं पर सरकार के ड्राफ्ट रूल्स को पूरी तरह हटाने के बजाय संशोधन की जरूरत', डॉक्टर शेख रईसुद्दीन का सीधा संदेश

हेड ऑफ डिपार्टमेंट जामिया हमदर्द एंड वाइस प्रेसिडेंट सोसाइटी ऑफ अल्टरनेटर्स टू एनिमल एक्सपेरिमेंट्स डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने पशुओं के लैब्स में प्रयोग पर सरकार के ड्राफ्ट रूल्स को लेकर इंडिया टीवी से खास बात की है।

पशुओं पर प्रयोगशाला में एक्सपेरीमेंट को लेकर सरकार ने ड्राफ्ट जारी किया है, जिस पर 5 नवंबर तक आपत्तियां दर्ज कराने का समय है। ऐसे में इंडिया टीवी ने इस मामले पर हेड ऑफ डिपार्टमेंट जामिया हमदर्द एंड वाइस प्रेसिडेंट सोसाइटी ऑफ अल्टरनेटर्स टू एनिमल एक्सपेरिमेंट्स डॉक्टर शेख रईसुद्दीन से बात की है।

एनिमल टेस्टिंग सिर्फ रिसर्च के लिए नहीं बल्कि हमारी इकोनॉमी से भी रिलेटेड: डॉक्टर शेख रईसुद्दीन

डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने पशुओं को लेकर आए सरकार के ड्राफ्ट रूल्स को लेकर इंडिया टीवी से खास बात की। उन्होंने कहा, "सबसे पहले तो मैं इंडिया टीवी को बधाई देना चाहूंगा कि उन्होंने इस तरीके की चर्चा का आयोजन किया है जो कि ह्यूमन वेलफेयर से भी जुड़ा है और एनिमल वेलफेयर से भी जुड़ा है। एनिमल टेस्टिंग सिर्फ रिसर्च के लिए नहीं है। यह हमारी इकोनॉमी से भी रिलेटेड है। एनिमल टेस्टिंग से ही ड्रग डेवलपमेंट होता है। दवाइयों का बनना भी होता है तो आपको पता होगा कि हमारी जीडीपी में औषधि उद्योग का बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन है और हम लोग ड्रग्स को अफ्रीकन कंट्रीज, अमेरिका, यूरोप, जापान को भेजते हैं।"

टेस्टिंग के दौरान लैब्स में एनिमल्स के साथ क्या होता है? 

डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने कहा, "ज्यादातर टेस्टिंग जो होती हैं, वो एनिमल्स पर होती हैं क्योंकि मानव पर डायरेक्ट टेस्ट नहीं कर सकते। इसमें चूहे, रैट्स आदि हैं। चूहे और रैट्स में अंतर होता है। सबसे ज्यादा टेस्टिंग रैट्स पर होती है। ये प्रजातियां लैब में बनाई गई हैं। उनकी ब्रीडिंग होती है। इनको बनाया जाता है। ऐसा नहीं है कि इन्हें कहीं से भी लाया गया हो।"

डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने बताया कि हर इंसान का जेनेटिक्स अलग होता है। इसी तरह चूहे, रैट्स और खरगोश के जेनेटिक्स भी अलग होते हैं। डॉक्टर शेख रईसुद्दीन के मुताबिक, लैब में टेस्टिंग के दौरान जानवरों को दर्द, गंभीर बीमारी आदि से गुजरना पड़ता है। अगर एनिमल को हाई डोज दे दिया गया तो उसकी मौत हो सकती है। 

डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने बताया कि एनिमल्स को दर्द भी होता है। लेकिन उसके लिए अगर ठीक से प्रयोग किए जाएं तो इस तरीके के कुप्रभाव को एनिमल्स में भी बचाया जा सकता है। उससे बचा जा सकता है।

किसी चीज को उगल नहीं सकते रैट

डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने बताया कि रैट में वोमिटिंग सेंस नहीं होते। ये किसी चीज को उगल नहीं सकते। हम लोग उगल देते हैं। अगर कड़वा या अच्छा नहीं लगा तो हम लोग वोमिटिंग कर देते हैं। रैट वोमिट नहीं करते। तो कितना फर्क हो गया। तो इस ढंग से डिफरेंस भी है। लेकिन क्योंकि बहुत से एक्सपेरिमेंट किए जाते, रिपीट किए जाते, कई बार किए जाते हैं।

तो कुछ हद तक जो दवाइयां इन जानवरों में सुरक्षित पाई जाती हैं, ये हम लोग सोच सकते हैं कि मनुष्य में भी होंगी। रैबिट में भी बहुत आते हैं। रैबिट बहुत सेंसिटिव होते हैं। उसको इसलिए गाजर खिलाते हैं। 

डॉक्टर शेख ने बताया, "हम एक दूसरे से अलग होते हैं। जैसे कि जो लोग यूरोपियन हैं। हैं ना? उनकी त्वचा में मेलेनिन नहीं पाया जाता, इसलिए उनमें स्किन कैंसर बहुत होता है। हमारे जो हम लोग इधर रहते हैं गर्म प्रदेशों में, भारत में, अफ्रीका में इनमें मेलेनिन पाया जाता है स्किन में त्वचा में।

केमिकल का इफेक्ट एनिमल्स और ह्यूमंस पर कितना डिफरेंट हो सकता है?

डॉक्टर शेख ने बताया, "यह काफी हद तक एक ही जैसा रहता और उसमें कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता लेकिन डिफरेंट भी हो सकता है। जैसे मैंने अभी आपको बताया कि ये डोज़ जो होती है जो जो डोज़ हम लेते हैं ये चूहों में अलग होगी और इंसानों में अलग होगी। है ना? तो कभी-कभी इससे फर्क पड़ सकता है। बिल्ली और गाय-भैंसों में बहुत से एंजाइम नहीं पाए जाते। दवाई का तो फर्क होता है लेकिन बहुत ज्यादा फर्क भी नहीं होता। ये भी मैं कहना चाहूंगा।"

कभी एनिमल टेस्टिंग में सेफ दिखी मेडिसिंस ह्यूमंस के लिए हार्मफुल प्रूव हुई?

डॉक्टर शेख ने बताया, "हां ऐसा हुआ है, पहले जेंटामाइसिन एंटीबायोटिक्स आई, जो एनिमल में ठीक पाई गई लेकिन बाद में पाया गया कि उससे किडनी की गुर्दे की बीमारियां हो रही थीं। कभी-कभी उम्र का भी फर्क पड़ता है। बच्चों में डोज़ अलग होगी और एडल्ट लोगों में या बुजुर्ग लोगों में डोज़ अलग होगी।"

डॉक्टर शेख ने बताया, "मेल में पीरियड नहीं होते, फीमेल में होते हैं, एनिमल्स में भी होते हैं, इसलिए उस दौरान अलग हार्मोन पैदा होते हैं तो फर्क आ जाता है। इस सब की फिर जो दवाई  बनती है तो इसमें बिलियंस ऑफ डॉलर्स का और करोड़ों अरबों रुपए का खर्च होता है तब कोई दवा बनती है क्योंकि सब तरीके की टेस्टिंग करी जाती है और इस सब का उद्देश्य होता है कि मानव का स्वास्थ्य सही रहे।"

क्या साइंस के पास अब ऐसे अल्टरनेटिव्स हैं जो एनिमल्स की जगह ले सकते हैं?

डॉक्टर शेख ने बताया, "ऐसा काफी हद तक हो सकता है। धीरे-धीरे ये हो रहा है क्योंकि जितनी प्रगति हो रही है साइंस में, उतना प्रभाव आ रहा है। चिप्स को लेकर ये काम किया जा रहा है।  ह्यूमन ऑन चिप, ऑर्गन ऑन चिप, लीवर-किडनी ये सब चिप्स के ऊपर किया जा सकता है लेकिन जब बिहेवियर स्टडीज की बात आएगी तो उसे नो डाउट हमें पूरा एनिमल पर ही करना होगा। जानवर में कोई खुद बीमारी है या जानवर को खाना ठीक से नहीं मिला, उसकी डाइट ठीक नहीं है तो उसके प्रभाव अलग आ सकते हैं।"

डॉक्टर शेख ने बताया, "एक न्यू अप्रोच मेथोडोलॉजीस आ रही हैं और खास करके ऑर्गन ऑनचिप, ह्यूमन ऑनचिप और एनिमल, ये काफी हद तक आगे चलकर, हमारे ख्याल से एक दशक के बाद ऐसा हो जाएगा कि कुछ ही स्थितियों में जानवरों पर रिसर्च करने की आवश्यकता रहेगी। कुछ स्थितियों में 100% तब भी नहीं।"

कौन से एनिमल एक्सपेरिमेंट्स सक्सेसफुली रिप्लेस किए जा चुके हैं? 

डॉक्टर शेख ने बताया कि बहुत से एनिमल एक्सपेरिमेंट्स सक्सेसफुली रिप्लेस किए जा चुके हैं। हम यूरोप में अपनी कोई कॉस्मेटिक या कोई प्रोडक्ट भेजते हैं तो ये सर्टिफाई करना होता है कि इनकी एनिमल्स में टेस्टिंग नहीं हुई। जैसे स्किन का मॉडल लैब में डेवलप कर लिया गया। जिसको रिकॉन्स्टिट्यूटेड ह्यूमन एपिथलियम कहते हैं। स्किन के इरिटेशन के बहुत से टेस्ट पहले एक टेस्ट होता था टॉक्सिसिटी का जो खरगोश की आंखों में किया जाता था जिसको ड्रेस टेस्ट कह थे। बहुत ही ज्यादा अमानवता से भरपूर था क्योंकि उसमें आंखों में हम दवा डाल के ये देखते थे कि आंखें कैसे रिएक्शन कर रहीं। ये पूरी तरीके से रिप्लेस हो गया। अब बैन हो गया इसके ऊपर। पूरा कहीं किसी भी देश में भारत में भी अब हम खरगोश के ऊपर ये ड्रेस टेस्ट नहीं कर सकते।

क्या एनिमल्स को लेकर लाए गए ड्राफ्ट रूल्स एनिमल टेस्टिंग को ग्रेजुअली रिप्लेस करने की डायरेक्शन में है?

डॉक्टर शेख ने बताया कि देखिए मैं एक सोसाइटी हूं। उसका वाइस प्रेसिडेंट हूं जिसका कि पर्पज है, जो 2017 में बनाई गई थी। जैसे आपने अभी अपने शुरुआत में उसका मेंशन भी किया। सोसाइटी फॉर अल्टरनेटिव एनिमल एक्सपेरिमेंट्स, जोकि अल्टरनेटिव एनिमल एक्सपेरिमेंट्स को हम प्रमोट करते हैं। ये 2017 में सोसाइटी बनी।

उन्होंने कहा कि संस्था और हम लोग काफी हद तक इसके काम कर रहे हैं और इसकी हर साल गोष्ठी होती है और वर्कशॉप होती है और ये एशियन सोसाइटी एशियन फेडरेशन के साथ भी हम जुड़े हुए हैं जो कि जापान में उसका हेड क्वार्टर है। इस तरीके के हम लोग काम कर रहे हैं और भारत में ये जो नया रेगुलेशन आया इसमें सरकार का भी इंटेंशन अच्छा है क्योंकि उसने सबसे ओपिनियन मांगा राय मांगी जो कि 5 नवंबर तक भारत के कोई भी साधारण नागरिक या प्रोफेसर टीचर साइंटिस्ट आप लोग जो हैं सोशल मीडिया के लोग और वैसे मीडिया के लोग भी अपना राय दे सकते हैं। ये एक अच्छा कदम है।

सरकार के ड्राफ्ट रूल्स पर क्या बोले?

डॉक्टर शेख ने कहा कि मैं किसी संस्था का नाम नहीं लेना चाह रहा। इसमें एक प्रावधान है जिसके तहत ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हम कुछ प्रयोगों के लिए जंगल से या कहीं से भी जानवरों का ले सकते हैं, पकड़ सकते हैं,  उस पर काम कर सकते हैं। तो एक ऐसा करके परसेप्शन हम लोगों में, वैज्ञानिकों में आ रहा है जो कि कुछ लोग उसको नहीं पसंद कर रहे हैं। मैं एक वैज्ञानिक हूं, अध्यापक भी हूं इस सब्जेक्ट का, टॉक्सिकोलॉजी का और अल्टरनेटिव एनिमल्स का। मेरी राय भी यही है कि कोई भी प्रयोग अगर हम कर रहे हैं तो वैश्विक रूप से उसकी स्वीकार्यता होनी चाहिए।

डॉक्टर शेख ने कहा कि ऐसा न हो कि हम कोई डॉग या कोई दूसरे एनिमल को पैसे लेकर ये काम कर रहे हैं, जिस पर दूसरा देश कहे कि भाई हम इसको मंजूर नहीं करते। हमारी दवाइयों को लेना बंद कर दे। हमारे पदार्थों को इंपोर्ट करना बंद कर दे। जैसे मैंने अभी एक कॉस्मेटिक्स का उदाहरण बताया कि अगर कॉस्मेटिक की टेस्टिंग अगर एनिमल में होगी तो हमें सर्टिफाई करना होता है कि ये कॉस्मेटिक एनिमल्स पर टेस्टिंग होकर नहीं बना है। तो अंतर अंतरराष्ट्रीय लेवल पर इसकी एक्सेप्टेबिलिटी होनी चाहिए। 

लुप्तप्राय प्रजातियों पर खतरा

डॉक्टर शेख ने कहा कि वाइल्ड एनिमल को किसी भी परिस्थिति में अनुमति नहीं देनी चाहिए। क्योंकि हम लोग हिंदुस्तानी लोग हैं। कुछ कमर्शियल इंटरेस्ट है। कुछ प्रजातियां हैं, जातियां हैं। जंगलों में रह रही हैं। अब जानवर पकड़-पकड़ के देने लगेंगे। ये ले लीजिए, वो ले लीजिए, ये लीजिए। ऐसे बहुत से जो है जो लुप्तप्राय प्रजातियां हैं, उनके ऊपर भी खतरा आ सकता है। मेरे ख्याल से एक इंपॉर्टेंट चीज है कि हमारा जो डाटा जनरेट होगा, जो उससे रिजल्ट बनेंगे उसकी एक्सेप्टेबिलिटी भी होनी चाहिए और दूसरा होता है साइंस में ट्रेसेबिलिटी भी होना चाहिए।

ड्राफ्ट में माइल्ड और मॉडरेट एक्सपेरिमेंट्स के अप्रूवल्स इंस्टीट्यूशनल कमिटीज को दिए जाने पर क्या बोले?

डॉक्टर शेख ने कहा कि इंस्टीट्यूशनल कमेटी ईमानदारी के साथ और नैतिकता के साथ अगर अपना काम करें तो इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है। लेकिन अक्सर होता है हम लोग बायोमीडिया निकाल लेते हैं। कुछ लोग इमोशनल हो जाते हैं कि हमारी पीएचडी होने वाली है। उसका टाइम खत्म हो रहा है। जल्दी से हमें ये अप्रूव कर दीजिए। तो हम लोग इमोशनली कोई डिसीजन ले सकते हैं। तो इंस्टीट्यूशनल ठीक है लेकिन ये जो आजकल की व्यवस्था ठीक अच्छी चल रही है और अगर रेगुलर ढंग से कमेटी की मीटिंग्स होती रहे तो इशू नहीं है हमारे संस्थान में हर दो-ती महीने बाद मीटिंग होती रहती तो किसी का समय नहीं बर्बाद होता है तो कुछ हद तक ये डिबेटेबल है और देखिए और लोगों और स्टेक होल्डर्स अपनी क्या-क्या राय देते हैं तो इंस्टीट्यूशनल ओवरसाइट होनी चाहिए लेकिन एक्सटर्नल मेंबर का होना भी एक अच्छा होता है। वो ओवरसाइट अच्छी हो जाती है।

इस ड्राफ्ट में संशोधन करने के लिए या फिर इसमें ऐड करने के लिए कोई सुझाव?

डॉक्टर शेख ने कहा कि जो वाइल्ड एनिमल्स हैं, उसको लेकर हम कुछ अच्छा कर सकते हैं। इसको हम लोग अवॉइड कर सकते हैं। दूसरा ये है कि डाटा की ट्रेसेबिलिटी होनी चाहिए। इसमें एनिमल की ट्रेसेबिलिटी तो है कि एनिमल कितने यूज़ हुए, क्या हुए लेकिन उस पर जो रिसर्च हुई, जो डाटा हुआ, उसको हम कहां तक रोक सकते हैं।

डॉक्टर शेख ने कहा कि दूसरा एक और इसमें एक और महत्वपूर्ण चीज है कि जहां पर एनिमल रखे जा रहे हैं, जी जहां पर एनिमल की ब्रीडिंग हो रही है। एक एनिमल से दूसरे एनिमल को बनाया जा रहा है। तो वहां का जो माहौल है, वहां का जो एनवायरमेंट है, जो उसकी सेटिंग है, उस पर हाइजीन होनी चाहिए। चीजें अच्छी होनी चाहिए ताकि डाटा की रिलायबिलिटी इंपॉर्टेंट चीज है कि डाटा की रिलायबिलिटी अच्छी होनी चाहिए। 

इंडिया को एनिमल फ्री रिसर्च में ग्लोबल लीडर बनाने के लिए गवर्नमेंट को क्या रेकमेंडेशन देंगे?

डॉक्टर शेख ने कहा, "मेरा सिर्फ यही रेकमेंडेशन है जब हम ये कह रहे हैं कि हम ग्लोबल लीडर बने तो हमें ग्लोबल स्टैंडर्ड्स फॉलो करना चाहिए जो कि सब जगह एक्सेप्टेबल हो। जैसे कि बहुत चीजों में हमने ग्लोबल लीडरशिप डेवलप की है ना दवाइयां उसमें एक बहुत उदाहरण है या आईटी प्रोडक्ट्स हैं, इंफॉर्मेशनेशन टेक्नोलॉजी के प्रोडक्ट इंडिया लीडरशिप रोल रखता है, इसी ढंग से हमें जो हमारी रिसर्च है, जिसको कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन कहते हैं, वो लोग भी बहुत सी रिसर्च करते हैं तो वहां के स्टैंडर्ड्स हमारे ग्लोबल स्टैंडर्ड्स होना चाहिए और क्योंकि हम लोग भारतीय लोग बहुत अच्छे माने जाते हैं।

डॉक्टर शेख ने कहा कि हमारी जीवन की ज्यादा वैल्यू डेफिनेटली होगी। लेकिन एनिमल्स को भी हम कम नहीं कर सकते। भारत में तो परंपरा है कि अभी इस जन्म में हम लोग इंसान है। अगले जन्म में क्या बन जाए? है ना? तो इतना हम लोग चिंता करते हैं कि हो सकता है हम चूहे बन जाए, गीदड़ बन जाए या मच्छर बन जाए। तो यही में वेलफेयर आता है कि हम एनिमल को अच्छे से ट्रीट करें। हमारे यहां पर भी रही है। हमारी संस्कृति भी है भारत की कि हम लोग जानवरों से बहुत प्यार करते हैं। हम लोग गाय को माता मानते हैं और बहुत से ऐसे एनिमल हैं जो कि हमारे देवी देवताओं के साथ जुड़े हुए हैं। तो ये हम देखते हैं कि दोनों चीजें अलग नहीं। एक दूसरे के पूरक मैं तो मानता हूं।

क्या एनिमल टेस्टिंग पूरी तरह खत्म की जा सकती है?

एनिमल टेस्टिंग पूरी तरह खत्म करने के सवाल पर डॉक्टर शेख ने कहा कि अभी ये संभव नहीं है। किसी भी देश में संभव नहीं है। AI फ्यूचर में आंशिक रूप से रिप्लेस करेगा। उन्होंने कहा कि पशुओं पर सरकार के ड्राफ्ट रूल्स को पूरी तरह हटाने के बजाय संशोधन की जरूरत है।

इससे पहले पशु लैब्स टेस्टिंग के नए नियमों के खिलाफ अंबिका शुक्ला सख्त हुईं थीं।

नोट: आप प्रस्तावित नियमों पर अपने सुझाव या आपत्तियां ईमेल के जरिए cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।

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