1. Hindi News
  2. भारत
  3. राष्ट्रीय
  4. "वतन से प्यार करते रहेंगे, लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की", 'वंदे मातरम' सर्कुलर पर जमीअत उलमा-ए-हिंद ने जताई चिंता

"वतन से प्यार करते रहेंगे, लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की", 'वंदे मातरम' सर्कुलर पर जमीअत उलमा-ए-हिंद ने जताई चिंता

जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि अगर बहुसंख्यक धर्म के लोग इसका पाठ करना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसा करने का अधिकार है, हम उनके रास्ते में नहीं आते।

जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी- India TV Hindi
Image Source : PTI जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी

नई दिल्ली: जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 'वंदे मातरम' को लेकर जारी किए गए सर्कुलर पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इसे संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत बताते हुए कहा कि यह कदम अनुच्छेद 25 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है।

मौलाना कासमी ने एक बयान में कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रचार करने और अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन यापन करने का अधिकार देता है। ऐसे में किसी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध किसी विशेष कविता या छंद का पाठ करने के लिए बाध्य करना संविधान की भावना के खिलाफ है।

"इस्लामी आस्था तौहीद पर आधारित"

उन्होंने का कि 'वंदे मातरम' के मूलपाठ, विशेषकर चौथे और पांचवें छंद में मूर्ति वंदना और कुछ हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है। इस्लामी आस्था तौहीद (एकेश्वरवाद) पर आधारित है, जिसके अनुसार मुसलमान अल्लाह के सिवा किसी अन्य की पूजा या इबादत नहीं कर सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कारण मुसलमान ऐसे किसी पाठ का हिस्सा नहीं बन सकते, जिसमें इबादत का तत्व शामिल हो।

हालांकि, मौलाना कासमी ने यह भी कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद 'वंदे मातरम' कविता के विरोध में नहीं है, अगर बहुसंख्यक धर्म के लोग इसका पाठ करना चाहते हैं, तो उन्हें इसका पूरा अधिकार है। हमें उनसे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन इसे सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य बना देना या स्कूलों में बच्चों को इसे पढ़ने के लिए बाध्य करना धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के समान होगा।

"धार्मिक आजादी के खिलाफ निर्णय स्वीकार नहीं"

उन्होंने आगे कहा कि भारत एक बहुलतावादी देश है, जहां विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। संविधान की सर्वोच्चता और अनेकता में एकता का सिद्धांत ही राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है। इस आधार को कमजोर करने वाला कोई भी कदम देशहित में नहीं हो सकता।

जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव ने कहा कि भारत के मुसलमान धार्मिक आजादी के खिलाफ किसी भी निर्णय को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि वह संवैधानिक प्रावधानों, न्यायिक परंपराओं और देश की सामाजिक विविधता को ध्यान में रखते हुए संबंधित सर्कुलर की तत्काल समीक्षा करे, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक गरिमा और सामाजिक सौहार्द कायम रह सके।

देशभक्ति के मुद्दे पर उन्होंने कहा, "देश-प्रेम हमारी धार्मिक आवश्यकता है। हम अपने वतन से प्यार करते हैं और करते रहेंगे। लेकिन किसी भी ऐसे शब्द या अभिव्यक्ति को स्वीकार नहीं किया जा सकता, जो पूजा की श्रेणी में आता हो और जो हमारी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध हो। हमारा संविधान ही वह आधार है, जिस पर यह देश एक मजबूत और पारदर्शी व्यवस्था की तरह खड़ा है।"

Latest India News