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Bihar Political Drama: राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त, न कोई स्थाई दुश्मन

साल 2013 में जब तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया था तब बड़े आलोचकों में नीतीश कुमार की गिनती हुई थी। संप्रदायिक छवि का मुद्दा बनाकर उन्होंने एनडीए से अलग होने का ऐलान कर दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव

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बिहार के महगठबँधन में महीनों से चले आ रहे गतिरोध का अंत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफ़े के साथ हो गया है। शाम को इस्तीफ़ा, रात को प्रधानमंत्री का खुला निमंत्रण, आधी रात को सरकार बनाने का प्रस्ताव और सुबह 10 बजे फिर से नीतीश का बतौर मुख्यमंत्री शपथग्रहण। बुलेट ट्रेन की तेज़ी से बिहार में सियासी घटनाक्रम बदले और देखते ही देखते बिहार सरकार का चेहरा बदल गया। लेकिन यह ना समझिए की आरजेडी-जेडीयू की सरकार से भाजपा-जेडीयू सरकार तक पहुँचने का सफ़र केवल 17 घंटे का था। इसकी पटकथा लंबे वक़्त से लिखी जा रही थी। नोटबंदी का समर्थन, रामनाथ कोविंद का पक्ष, बेनामी संपत्ति पर केंद्र के रूख की तारीफ़ महागठबंधन को शुरू से ही असहज कर रहा था और लालू को आगाह। नीतीश कुमार तेजस्वी को मुद्दा बनाकर इस्तीफ़ा दे देंगें ऐसी कल्पना लालू ने नहीं की होगी लेकिन उन्हें हैरानी नहीं होनी चाहिए। ऐसा नीतीश पहली बार नहीं कर रहे।

मोदी के नाम पर टूट

साल 2013 में जब तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया था तब बड़े आलोचकों में नीतीश कुमार की गिनती हुई थी। संप्रदायिक छवि का मुद्दा बनाकर उन्होंने एनडीए से अलग होने का ऐलान कर दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू अकेले मैदान में उतरी। आशा के विपरीत परिणाम ने उन्हें इस्तीफ़ा देने पर मजबूर किया और जीतनराम मांझी को बिहार की कमान दे दी। यह भी ज़्यादा दिनों तक नहीं चला और मांझी पर भाजपा से साँठ-गाँठ का आरोप लगा कर मांझी भी जाने पर मजबूर हो गए।

तेजस्वी के नाम पर फूट

बिहार विधानसभा चुनावों का समय क़रीब था। भाजपा से अलग हुए नीतीश कुमार कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत कांग्रेस से जुड़ते संभव था लेकिन धुर्र विरोधी लालू यादव के साथ एक असहज गठबंधन सत्ता की माँग थी। जंगलराज भूलकर जब नीतीश 'चंदन की लकड़ी' बनने को तैयार हुए तो किसे पता था यह भाईचारा 20 महीने ही चलेगा। लालू यादव और उनके परिवार पर चल रहे सीबीआई, ईडी के छापे उप मुख्यमंत्री तेजस्वी के इस्तीफ़े की माँग तक तो पहुँच रहे थे लेकिन सत्ता में छोटा भाई बड़े से इस्तीफ़ा कैसे माँगता इसलिए ख़ुद नीतीश ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पद त्याग दिया। नीतीश अंधेरे में तीर नहीं चला रहे थे, एक इस्तीफ़े ने उनकी छवि और सरकार दोनों बचा ली। अब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई जा रही है।

नीतीश कुमार की राजनीतिक सोच बड़ी सिलेक्टिव है जो मौक़े पर बदल जाती है। कभी उन्हें कथित संप्रदायिकता खलती है कभी भ्रष्टाचार। सच यह भी है की आरजेडी, कांग्रेस या कोई भी अन्य दल नीतीश कुमार की कितनी भी आलोचना क्यूँ न कर लें लेकिन उनके जैसा साफ़ छवि का नेता न होने का ख़ामियाज़ा तो उठाना ही होगा।समय का चक्र घूमता है कब किसको किसकी ज़रूरत पड़ जाए कहना मुश्किल है इसलिए जब भी राजनीति के विद्यार्थी गठबंधन रणनीति समझना चाहेंगे नीतीश कुमार की चतुराई 'न स्थाई मित्रता न स्थाई बैर ' को ज़रूर पढ़ना चाहेंगे।

(ब्‍लॉग लेखिका मीनाक्षी जोशी देश के नंबर वन चैनल इंडिया टीवी में न्‍यूज एंकर हैं) 

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