गोली लगी, जंगल में छिपा रहा और घाव पर लगाता रहा शहद... मारे गए लश्कर कमांडर मूसा को लेकर खुलासा
मारे गए लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर हाशिम मूसा को गोली लगी थी। इलाज की सुविधा नहीं मिलने पर वह अपने घाव पर शहद लगाता था। उसके साथी यासिर के फोन से घाव पर शहद लगे मूसा की तस्वीरें मिलीं।

जम्मू-कश्मीर में मारे गए लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के शीर्ष कमांडर मोहम्मद आसिफ उर्फ 'हाशिम मूसा' ने जंगल में छिपे रहने के दौरान गोली के घावों को ठीक करने के लिए शहद का इस्तेमाल किया था। अधिकारियों के मुताबिक, सुरक्षा बलों की घेराबंदी के कारण उसे लंबे समय तक चिकित्सकीय मदद नहीं मिल सकी, जिसके बाद उसने घावों पर शहद लगाना शुरू किया।
अधिकारियों के अनुसार, मूसा को पाकिस्तान सेना की विशिष्ट स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (SSG) का पूर्व कमांडो माना जाता था। वह जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का प्रमुख ऑपरेशनल कमांडर था और वर्ष 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के प्रमुख साजिशकर्ताओं में शामिल बताया गया। मूसा को इसी सप्ताह मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के यूसमर्ग में सेना के एक उच्च ऊंचाई वाले अभियान में मार गिराया गया।
राजौरी में मुठभेड़ के दौरान लगी थी गोली
अधिकारियों ने बताया कि मूसा को जम्मू क्षेत्र के राजौरी में 'ऑपरेशन शेरुवाली' के दौरान डोरिमल-गंभीर मुगला इलाके में हुई मुठभेड़ में गोली लगी थी। दो आतंकियों की तलाश में यह अभियान 45 दिनों से अधिक समय तक चला था। बाद में सामने आया कि जंगल में फंसे दोनों आतंकी मूसा और उसका सहयोगी यासिर थे। दोनों ने पुंछ और राजौरी के घने जंगलों में लंबे समय तक सुरक्षा बलों से बचते हुए ठिकाना बनाए रखा।
यासिर के फोन से सामने आईं तस्वीरें
अधिकारियों के मुताबिक, सितंबर के पहले सप्ताह में यूसमर्ग के ऊंचे इलाकों में यासिर के मारे जाने के बाद उसके पास से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ। फोन में मूसा के गोली के घावों की तस्वीरें मिलीं, जिनमें घावों पर शहद लगाया गया था। बताया गया कि इन तस्वीरों को सीमा पार पाकिस्तान में मौजूद आतंकियों के आकाओं तक भेजा गया था, ताकि उन्हें मूसा की स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी दी जा सके। अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तानी हैंडलर शहद की शुद्धता सुनिश्चित करने के निर्देश भी दे रहे थे, ताकि घाव जल्दी भर सकें।
आयुर्वेद में शहद से घावों का उपचार
ऑल इंडिया डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन के अध्यक्ष डॉ. आरपी पाराशर के मुताबिक, आयुर्वेद में शहद का इस्तेमाल घावों की देखभाल के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है। उन्होंने 'सुश्रुत संहिता' का जिक्र करते हुए बताया कि 'व्रण चिकित्सा' में शहद को शोधन और रोपण यानी घाव की सफाई और उपचार से जुड़े गुणों वाला माना गया है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक शोध में भी शहद की कुछ विशेषताओं के कारण उसके संभावित रोगाणुरोधी प्रभाव सामने आए हैं। शहद की उच्च ऑस्मोटिक गतिविधि, अम्लीय पीएच और कुछ प्रकार के शहद में हाइड्रोजन पेरॉक्साइड बनने जैसी प्रक्रियाएं सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकने में मदद कर सकती हैं।
विशेषज्ञों ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि गोली के घाव का इलाज सामान्य चोट से अलग होता है। डॉ. पाराशर के अनुसार, ऐसे घाव को अच्छी तरह साफ करना बेहद जरूरी है, क्योंकि गोली के छोटे कण या अन्य बाहरी पदार्थ अंदर रह जाने पर संक्रमण और जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि चिकित्सकीय उपचार में स्टेराइल मेडिकल-ग्रेड हनी का इस्तेमाल किया जाता है। सामान्य या अशुद्ध शहद को खुले गोली के घाव पर लगाना सुरक्षित चिकित्सकीय विकल्प नहीं माना जा सकता।
पशु चिकित्सा विशेषज्ञ ने बताया शहद का असर
पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. जहांजेब सिरवाल ने बताया कि शहद एक ऑस्मोटिक एजेंट की तरह काम कर सकता है। इससे घाव से अतिरिक्त द्रव बाहर खिंचने, मृत ऊतक को हटाने और सूजन कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण और जंगल जैसे क्षेत्रों में लोग जलने या चोट लगने की स्थिति में पारंपरिक तौर पर शहद का इस्तेमाल करते रहे हैं और पशुओं के घावों में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
पांच साल से चल रही थी मूसा की तलाश
मूसा की मौत को जम्मू-कश्मीर में सक्रिय एक प्रमुख आतंकी कमांडर की करीब पांच साल लंबी तलाश का अंत माना जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, वह सुरक्षा बलों और नागरिकों पर हुए एक दर्जन से अधिक बड़े आतंकी हमलों में सीधे तौर पर शामिल था। उस पर अप्रैल 2023 में पुंछ के भाटा धुरियां में हुए घात लगाकर किए गए हमले की साजिश में शामिल होने का आरोप था, जिसमें पांच जवान मारे गए थे। मई 2023 में राजौरी के कांडी जंगल में हुए विस्फोट में भी पांच कमांडो की मौत हुई थी। दिसंबर 2023 में पुंछ के डेरा की गली में हुए हमले में चार सैन्यकर्मी मारे गए। मई 2024 में शसितार के पास भारतीय वायुसेना के काफिले को निशाना बनाया गया, जिसमें एक वायुसैनिक की मौत हुई।
गैर-सैन्य ठिकानों को भी बनाया निशाना
2024 के उत्तरार्ध में मूसा के नेटवर्क ने गैर-सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाना शुरू किया। 20 अक्टूबर को गांदरबल में गगनगीर सुरंग परियोजना के निर्माण शिविर पर हमला हुआ, जिसमें एक स्थानीय चिकित्सक समेत सात लोगों की मौत हुई। इसके चार दिन बाद बुटापथरी में सेना के एक वाहन पर हमला किया गया। इस घटना में दो जवानों और दो नागरिक रक्षा पोर्टरों की मौत हुई थी।
पहलगाम हमले के प्रमुख साजिशकर्ताओं में था शामिल
अधिकारियों के मुताबिक, मूसा वर्ष 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के प्रमुख साजिशकर्ताओं में शामिल था। बैसरन के घास के मैदान में हुए इस हमले में मुख्य रूप से पर्यटकों समेत 26 लोगों की मौत हुई थी।
(इनपुट- PTI)
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