श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में मस्जिदों में शुक्रवार की नमाज के दौरान दिए जाने वाले खुतबा (धार्मिक उपदेश) के विषय पहले से तय करने की पहल पर सियासी विवाद शुरू हो गया है। जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड ने केंद्र शासित प्रदेश की मस्जिदों में एक समान खुतबा लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसके तहत धार्मिक उपदेशों के विषय पहले से निर्धारित किए जाएंगे और उपदेशकों की एक समिति से उन्हें मंजूरी दिलाई जाएगी। इस पहल पर पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक एवं प्रवक्ता तनवीर सादिक ने आपत्ति जताई है।
महबूबा मुफ्ती ने धार्मिक मामलों में दखल का लगाया आरोप
महबूबा मुफ्ती ने कहा कि बीजेपी के पास शायद मुसलमानों को परेशान करने और उनके धार्मिक मामलों में दखल देने के अलावा कोई काम नहीं रह गया है। उन्होंने मस्जिदों और जियारतगाहों से जुड़े विवादों का जिक्र करते हुए कहा कि पहले समान नागरिक संहिता (UCC) की बात हुई और अब धार्मिक उपदेशों में भी एकरूपता लाने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने कहा कि मस्जिदें हमारी आस्था और लोगों के योगदान से बनी हैं। वहां के मौलवी और इमाम बेहतर जानते हैं कि उन्हें अपने ख़ुतबे में क्या कहना है। अब ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है कि बीजेपी या RSS के दफ्तर से तय होगा कि शुक्रवार के ख़ुतबे में इमाम साहब क्या बोलेंगे। इस तरह की दखलअंदाज़ी हमें किसी भी सूरत में मंज़ूर नहीं है।
वक्फ बिल के खिलाफ भी हमने विधानसभा में प्रस्ताव लाकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हमारा स्पष्ट मानना है कि किसी भी पार्टी या सरकार को किसी धर्म के धार्मिक मामलों में इस तरह दखल देने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
अगर किसी इलाके में कोई हादसा होता है, तो इमाम साहब अपने खुतबे में उस पर बात करते हैं। अगर सरकार खुतबों में एकरूपता लाना चाहती है और चाहती है कि किसी खास मुद्दे पर सभी जगह बात हो, तो इसके लिए मीरवाइज उमर फारूक साहब की अध्यक्षता वाली मजलिस-ए-मुत्तहिदा मजलिस-उल-उलमा से बातचीत की जा सकती है। धार्मिक मामलों पर फैसला लेने के लिए संबंधित धार्मिक विद्वानों से सलाह ली जानी चाहिए।
सवाल यह है कि हमारे धार्मिक मामलों में फैसला लेने वाले ये लोग कौन होते हैं? अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू को इस्लाम और मुसलमानों की समस्याओं के बारे में जानकारी हो सकती है, लेकिन हमारे धार्मिक मामलों में क्या कहा जाना चाहिए, इसका फैसला हमारे धार्मिक विद्वानों और इमामों पर छोड़ देना चाहिए। हम इस तरह की दखलअंदाज़ी को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं और इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेंगे।
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने आदेश वापस लेने की मांग की
नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक और प्रवक्ता तनवीर सादिक ने भी वक्फ बोर्ड की पहल पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह मामला किसी की तारीफ करने का नहीं, बल्कि यह सही और गलत के बीच फ़र्क करने के बारे में है; ऐसे आदेश वही दे सकता है जिसकी सोच गलत हो। इसीलिए नेशनल कॉन्फ़्रेंस मांग करती है कि इस आदेश को तुरंत वापस लिया जाए। जहाँ तक मुझे पता है, MMU ने इस मामले पर चर्चा की है और मेरा मानना है कि उनका भी कोई बयान आया है। वे ही इस पर फ़ैसला ले सकते हैं, न कि वाइस चेयरपर्सन या कोई और; आगे क्या करना है, यह वे ही तय करेंगे। मुझे पूरा भरोसा है कि वे जल्द ही एक बयान जारी करेंगे—ऐसा बयान जो धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता हो।
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