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झारखंड में मछली पालन का नया तरीका, बेकार पड़ी कोयला खदानों से बरस रहा पैसा

झारखंड में परित्यक्त कोयला खदानों के गड्ढों को मछली पालन के लिए उपयोग किया जा रहा है। इससे ग्रामीणों को रोजगार मिला है, प्रोटीन की कमी पूरी हुई है और खनन से प्रभावित लोगों को नया जीवन मिला है।

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Image Source : PIXABAY REPRESENTATIONAL झारखंड में बेकार पड़ी कोयला खदानों से अब टनों में मछलियां पैदा हो रही हैं।

रामगढ़: झारखंड में कोयला खदानों के खाली पड़े पानी भरे गड्ढे मछली पालन में काफी काम आ रहे हैं। ये गड्ढे न सिर्फ लोगों को कमाई का जरिया दे रहे हैं, बल्कि गांवों में प्रोटीन की कमी को भी पूरा कर रहे हैं। झारखंड में ऐसे 1,741 गड्ढे हैं, जिनमें से कई 1980 के जमाने से खाली पड़े हैं। रामगढ़ जिले में 22 एकड़ का आरा कोयला गड्ढा आज एक मिसाल बन चुका है। इसमें मछली पालन की शुरुआत शशिकांत महतो ने 2010 में की। शशिकांत, जो अब कुजू मछुआरा सहकारी समिति के सेक्रेटरी हैं, ने बिना किसी खास साजो-सामान के इस गड्ढे में मछली पालन शुरू किया। पहली बार में ही 15 किलो की कतला मछली निकली, जिसने उन्हें सरकारी मेले में पहला इनाम और 5,000 रुपये की नकद रकम दिलाई। साथ में उन्हें 4 मछली पालन के पिंजरे भी मिले।

4 पिंजरों में पैदा की 6 से 7 टन मछली

2012 तक शशिकांत ने 4 पिंजरे लगाए और 6-7 टन मछलियों का उत्पादन किया। फिर उन्होंने गांव वालों के साथ मिलकर कुजू मछुआरा सहकारी समिति बनाई। इस समिति ने सरकार की मदद ली, जैसे नेशनल मिशन फॉर प्रोटीन सप्लीमेंट्स और डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) से फंड। आज 68 लोग इस समिति में हैं और आरा गड्ढे में 126 पिंजरे चला रहे हैं। इन पिंजरों का 4 करोड़ रुपये का इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह सरकार ने बनवाया। पिछले साल इस गड्ढे से 40 टन पंगासियस और मोनोसेक्स तिलापिया मछलियां निकलीं, जो स्थानीय बाजारों से लेकर बिहार तक में बिकीं। समिति एक और 16 एकड़ के गड्ढे पर भी काम कर रही है, जो 1988 से खाली था। वहां से अभी तक 10 टन मछलियां निकली हैं।

Image Source : PTIपिंजरे वाले मछली पालन के तरीके से उत्पादन काफी ज्यादा बढ़ जाता है।

सामने आई थीं कई बड़ी मुश्किलें

मछली पालन शुरू करना आसान नहीं था। शशिकांत बताते हैं, 'हमने अपनी जमीन खनन के लिए दी थी, लेकिन इन गड्ढों में मछली पालन के लिए कोयला कंपनी से एनओसी लेनी पड़ती है।' जिला कलेक्टर और राज्य सरकार ने मदद की और मंजूरी मिल गई। झारखंड के मत्स्य विभाग के डिप्टी डायरेक्टर शंभु प्रसाद यादव कहते हैं, 'रामगढ़ में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) के कई गड्ढे हैं, जहां साल भर पानी रहता है। इनका इस्तेमाल मछली पालन के लिए हो सकता है।' अभी इन गड्ढों से हर हेक्टेयर में 200 किलो मछली मिल रही है, लेकिन पिंजरे वाले मछली पालन से यह 10,000 किलो तक हो सकता है।

झारखंड के कई जिलों में फैला काम

यह काम अब झारखंड के कई जिलों में फैल रहा है। रामगढ़, रांची, बोकारो और चतरा में 16 गड्ढों में मछली पालन शुरू हो चुका है। इनमें रांची, रामगढ़ और हजारीबाग में तीन-तीन, बोकारो में दो और चतरा में एक गड्ढा है। इसके अलावा दुमका, पाकुड़, पलामू और साहिबगंज में 10 परित्यक्त पत्थर खदानों में भी मछली पालन हो रहा है। लोगों को शक था कि कोयला गड्ढों की मछलियां खाने लायक हैं या नहीं। यादव बताते हैं कि सरकार ने पानी और मछलियों की जांच की थी। कोई जहरीला पदार्थ नहीं मिला। बस कोयला गड्ढों की मछलियों का रंग जलाशयों की मछलियों से थोड़ा गहरा होता है। गड्ढों की गहराई 150-200 फीट है, और मछुआरे नाव से पिंजरों तक पहुंचते हैं।

Image Source : PTIआपको झारखंड की कई परित्यक्त कोयला खदानों में ऐसे पिंजरे देखने को मिल जाएंगे।

रोजगार और खाने की कमी को किया पूरा

रामगढ़ जैसे इलाकों में जमीन ज्यादातर जंगल या खनन के लिए है, जिससे रोजगार और खाने की कमी रहती है। मछली पालन से लोगों को काम मिल रहा है और प्रोटीन की जरूरत भी पूरी हो रही है। झारखंड में खनन की वजह से बेघर हुए परिवारों को नया सहारा मिल रहा है। कानून कहता है कि कोयला कंपनियों को पुरानी खदानों को भरना या ठीक करना चाहिए, लेकिन ये काम महंगा होने की वजह से अक्सर नहीं होता। खासकर 2009 से पहले की खदानों में ये दिक्कत ज्यादा है। झारखंड का ये मॉडल दिखाता है कि बेकार पड़े गड्ढों को कमाई का जरिया बनाया जा सकता है। झारखंड में 1,741 परित्यक्त गड्ढे हैं, जिनका इस्तेमाल मछली पालन के लिए हो सकता है। ये मॉडल न सिर्फ झारखंड, बल्कि देश के दूसरे खनन वाले इलाकों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है। (PTI)