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अब इन खास फूलों की मदद से बनेगी बिजली! झारखंड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की बड़ी खोज

झारखंड की सेंट्रल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने संध्या मालती फूल की पंखुड़ियों से प्राकृतिक डाई आधारित सौर सेल विकसित किया है। यह तकनीक सस्ती, ईको-फ्रेंडली और सुरक्षित मानी जा रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भविष्य में यह इनोवेशन आम लोगों तक स्वच्छ और टिकाऊ सौर ऊर्जा पहुंचाने में मददगार साबित हो सकता है।

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Image Source : CUJ झारखंड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने संध्या मालती फूलों की मदद से खास सौर सेल विकसित किया है।

रांची: स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा के क्षेत्र में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड यानी कि CUJ के वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के ऊर्जा इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने संध्या मालती (Mirabilis Jalapa) फूल की पंखुड़ियों से ऐसा सौर सेल विकसित किया है, जो कम लागत वाला, ईको-फ्रेंडली और सुरक्षित माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक भविष्य में सौर ऊर्जा को आम लोगों तक आसानी से पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

झारखंड सहित पूरे देश में मिलते हैं ये खास फूल

यह शोध प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से हरित ऊर्जा विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। शोधकर्ताओं ने संध्या मालती फूल की पंखुड़ियों से प्राकृतिक रंग निकाला और उसका इस्तेमाल डाई-सेंसिटाइज्ड सोलर सेल्स (DSSC) यानी ग्रैट्ज़ेल सेल्स में किया। यह तकनीक सूर्य की रोशनी को सीधे बिजली में बदलने का काम करती है। संध्या मालती फूल को 'Four O' Clock Flower, गुल-अब्बास और गुल-बख्शी के नाम से भी जाना जाता है। यह पौधा झारखंड सहित देशभर में आसानी से पाया जाता है।

शाम 4 बजे के बाद खिलते हैं संध्या मालती के फूल

संध्या मालती फूल की खासियत यह है कि इसके फूल आमतौर पर शाम 4 बजे के बाद खिलते हैं, इसलिए इसे 'फोर ओ क्लॉक फ्लावर' कहा जाता है। यह पौधा लंबे समय से औषधीय, सजावटी और पारंपरिक चिकित्सा में भी इस्तेमाल होता रहा है। ऊर्जा इंजीनियरिंग विभाग के सह-प्राध्यापक और इस शोध के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. बसुदेव प्रधान ने बताया कि फूल से निकाले गए प्राकृतिक रंग का उपयोग सौर सेल में 'सेंसिटाइजर' के रूप में किया गया। यह सेंसिटाइज़र सूर्य की रोशनी को अवशोषित कर इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह को सक्रिय करता है, जिससे बिजली उत्पन्न होती है।

नेचुरल डाई आधारित सौर सेल तकनीक बड़ी उपलब्धि

डॉ. बसुदेव प्रधान ने बताया कि अब तक किए गए परीक्षणों में वैज्ञानिकों को 0.61 प्रतिशत की अधिकतम पावर कन्वर्ज़न एफिशिएंसी (PCE) और करीब 250 घंटे तक स्थिरता हासिल हुई है। हालांकि यह शुरुआती स्तर का परिणाम है, लेकिन प्राकृतिक डाई आधारित सौर सेल तकनीक के लिए इसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। डॉ. प्रधान के मुताबिक, शोध टीम ने फूल के अर्क और उसके विभिन्न रासायनिक तत्वों का गहराई से अध्ययन किया। क्वांटम रासायनिक गणनाओं से यह अनुमान लगाया गया कि फूल के 6 प्रमुख डाई घटकों में से प्रत्येक 13.9 प्रतिशत से 20.8 प्रतिशत तक दक्षता देने की क्षमता रखता है।

सिंथेटिक डाई के मुकाबले सस्ती है इन फूलों से बनी डाई

डॉ. प्रधान ने बताया कि वर्तमान में सौर सेल में इस्तेमाल होने वाली सिंथेटिक डाई काफी महंगी और पर्यावरण के लिए हानिकारक होती हैं। खासकर रूथेनियम आधारित डाई, जिनकी दक्षता लगभग 13 प्रतिशत मानी जाती है, पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित नहीं हैं। इसके विपरीत संध्या मालती फूल से प्राप्त प्राकृतिक डाई पूरी तरह गैर-विषैली, जैव-अपघटनीय और बेहद सस्ती है। डॉ. प्रधान ने कहा कि यह प्राकृतिक रंग गैर-खाद्य स्रोत से प्राप्त होता है, इसलिए इसका खाद्य सुरक्षा पर भी कोई असर नहीं पड़ता।

भविष्य में कई गुना बढ़ सकती है इस तकनीक की क्षमता

डॉ. प्रधान ने  बताया कि फूल से निकाला गया रंग इथेनॉल में आसानी से घुल जाता है और इसमें मौजूद कार्बोनिल तथा हाइड्रॉक्सिल समूह टाइटेनियम डाइऑक्साइड नैनोकणों के साथ मजबूती से जुड़ जाते हैं। यही गुण इसे DSSC तकनीक के लिए बेहद उपयुक्त बनाते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि प्राकृतिक डाई निकालने की प्रक्रिया और उपकरणों की गुणवत्ता में और सुधार किया जाए, तो भविष्य में इस तकनीक की क्षमता कई गुना बढ़ाई जा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तकनीक आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में अहम भूमिका निभा सकती है।

रिसर्च से भविष्य में सस्ती सौर ऊर्जा की जगी उम्मीद

डॉ. बसुदेव प्रधान के नेतृत्व में इस रिसर्च को पूरा करने में प्रशांत कुमार, अंशु कुमार, आयुषी परीक, एनामूल हक और अनिक सेन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'Journal of Power Sources' में प्रकाशित हुआ है, जिसे ऊर्जा और पावर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र की प्रमुख शोध पत्रिकाओं में गिना जाता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि इस तरह की प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित तकनीकों को बड़े स्तर पर विकसित किया जाए, तो भविष्य में सस्ती, सुरक्षित और ईको-फ्रेंडली सौर ऊर्जा आम लोगों तक आसानी से पहुंचाई जा सकेगी।