रांची: सीआईडी के द्वारा पूछताछ के लिए सोमवार को बुलाए जाने के बाद JPSC में बड़ा प्रशासनिक बदलाव सामने आया है। आयोग के तीन सदस्यों अजीता भट्टाचार्य, जमील अहमद और अनिमा हांसदा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। तीनों सदस्यों ने अपना त्यागपत्र राज्यपाल को भेज दिया है। JPSC में कथित परीक्षा अनियमितताओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच तीन सदस्यों के एक साथ इस्तीफे को अहम घटनाक्रम माना जा रहा है। आयोग में अजीता भट्टाचार्य, अनिमा हांसदा और जमाल अहमद सदस्य के रूप में सूचीबद्ध रहे हैं।
छात्रों की सरकार के साथ हुई बैठक
बता दें कि इससे पहले JPSC-JSCC उम्मीदवारों के विरोध-प्रदर्शन के बीच उम्मीदवारों के प्रतिनिधिमंडल ने झारखंड सरकार के मंत्री से मुलाकात की। मुलाकात के बाद झारखंड के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने कहा, "आज तीसरे दिन की वार्ता और व्यापक विचार-विमर्श के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देशों पर सरकार ने तय किया कि 14वीं JPSC और 2023-25 की बैकलॉग भर्तियों से जुड़ी अनियमितताओं को दो तरीके से देखा जाएगा। आपराधिक पहलुओं की जांच CID करेगी। इसके अलावा वित्तीय असर और अवैध वित्तीय लेन-देन के सबूतों को देखते हुए ED से जांच कराने का अनुरोध किया जाएगा।"
90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल की जाएगी
उन्होंने आगे कहा, "इसके बाद एक फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाई जाएगी और 90 दिनों के भीतर आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की जाएगी।" इसके अलावा जरूरी सुधारों के बारे में सरकार ने कहा कि "इस प्रक्रिया का मार्गदर्शन करने के लिए IIT-ISM, IIM रांची और XLRI के विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर सुधार किया जाएगा।" इन चर्चाओं के बाद, छात्र प्रतिनिधियों ने CGL परीक्षा रद्द करने की मांग की और सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि चूंकि परीक्षा हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आयोजित की गई थी इसलिए इसे रद्द करने का अधिकार सरकार के पास नहीं है।"
छात्रों ने प्रस्ताव को स्वीकार करने से किया इनकार
उन्होंने कहा, "सरकार ने एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में निगरानी समिति बनाकर जांच की देखरेख करने का प्रस्ताव दिया, मगर छात्रों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हमारा मानना है कि सरकार उठाए गए 98 प्रतिशत बिंदुओं पर सहमत हो गई और बाकी दो प्रतिशत जो विशेष रूप से CGL परीक्षा रद्द करने की मांग है। इस पर सरकार का कहना है कि कोर्ट के आदेश पर जो परीक्षा कराई गई है, उसे सरकार अपनी तरफ से रद्द नहीं कर सकती है। छात्रों में विश्वास पैदा करने के लिए सरकार CID के काम की निगरानी के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति बनाने को तैयार थी, ताकि अगर छात्रों को लगे कि CID उनकी बात नहीं सुन रही है, तो वे अपनी चिंताएं व्यक्त कर सकें। कुल मिलाकर, इन प्रक्रियाओं और प्रयासों के बाद हमारा मानना है कि सरकार ने आंदोलन को समाप्त करने के अपने प्रयास में छात्रों के प्रति सच्ची सद्भावना और संवेदनशीलता दिखाई है।" (इनपुट- मुकेश)
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