आचार्य चाणक्य ने नीति शास्त्र के जरिए जीवन को सुधारने के लिए कई तरह की शिक्षाएं दी हैं। नीति शास्त्र में आचार्य चाणक्य ने उन अवगुणों के बारे में भी बताया है जिनके कारण अन्न-धन और विद्या का नाश हो सकता है। इन अवगुणों से व्यक्ति को हमेशा दूरी बनानी चाहिए। आइए विस्तार से जानते हैं इसके बारे में।
श्लोक
आलस्योपहता विद्या परहस्तं गतं धनम्।
अल्पबीजहतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्।।
पहला अवगुण
ऊपर दिए गए श्लोक में आचार्य चाणक्य बताते हैं कि व्यक्ति के आलसी होने पर विद्या का नाश हो जाता है। तात्पर्य ये है कि जिस विद्या को आप जानते हैं उसका निरंतर अभ्यास आपको करना चाहिए और विद्या ग्रहण करने में कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिए। अगर आप आलस्य करते हैं तो विद्या नष्ट हो सकती है। आपका यह अवगुण आपके लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। विद्यार्थियों को आचार्य चाणक्य की इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
दूसरा अवगुण
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दूसरे के हाथ में जाने से धन का नाश हो जाता है। इसका अर्थ है कि अगर आप किसी दूसरे के हाथ में अपना धन देते हैं तो समय पर वो आपको वापस मिल जाए यह निश्चित नहीं होता। एक तरह से आचार्य चाणक्य उधार देने से, सट्टेबाजी करने से व्यक्ति को दूर रहने की सलाह दे रहे हैं। इसलिए आचार्य कहते हैं कि अपना धन कभी भी दूसरे के हाथ में नहीं देना चाहिए।
तीसरा अवगुण
चाणक्य नीति के अनुसार बीज की कमी से अच्छी खेती नहीं होती और जमीन भी उपजाऊ नहीं रहती जिसके चलते अन्न की कमी होती है। कुल-मिलाकर चाणक्य यह समझाने की कोशिश करते हैं कि अच्छी फसल के लिए पर्याप्त मात्रा में बीज का होना बेहद जरूरी है अन्यथा फसल या अन्न नष्ट हो सकता है।
इन तीन अवगुणों के अलावा आचार्य चाणक्य ऊपर दिए गए श्लोक में यह भी बाते हैं कि बिना सेनापति के सेना नष्ट हो जाती है। चाणक्य के अनुसार जिस सेना का सेनापति ही न हो वो सेना अपने क्षेत्र की रक्षा नहीं कर सकती और युद्ध में उस सेना को हार का सामना ही करना पड़ता है। अगर आप जानना चाहते हैं कि चाणक्य नीति में आचार्य चाणक्य ने किन स्थानों को तुरंत छोड़ने को कहा है तो इस बारे में आप हमारी वेबसाइट पर विस्तार से लेख पढ़ सकते हैं।
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