1. Hindi News
  2. धर्म
  3. त्योहार
  4. Navratri Day 2 Vrat Katha: क्यों पड़ा था मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप का नाम ब्रह्मचारिणी? यहां पढ़ें संपूर्ण कथा और महत्व

Navratri Day 2 Vrat Katha: क्यों पड़ा था मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप का नाम ब्रह्मचारिणी? यहां पढ़ें संपूर्ण कथा और महत्व

नवरात्रि का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। इस दिन देवी मां की आराधना करने से भक्तों को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं कि माता दुर्गा के दूसरे स्वरूप का नाम ब्रह्मचारिणी कैसे पड़ा। यहां पढ़िए पौराणिक कथा।

मां ब्रह्मचारिणी- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV मां ब्रह्मचारिणी

12 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन है। इस दिन माता ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है। बता दें कि नवरात्रि के पूरे नौ दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरुपों की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी  की उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, संयम और सदाचार आदि की वृद्धि होती है। भगवती का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जीवन की सभी परेशानियों का नाश होता है। कठोर साधना और ब्रह्म में लीन रहने के कारण भी इनको ब्रह्मचारिणी कहा गया है। ब्रह्मचारिणी रूप की आराधना से आयु में वृद्धि होती है। तो आइए जानते हैं कि मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप का नाम ब्रह्मचारिणी कैसे पड़ा। यहां पढ़िए माता ब्रह्मचारिणी से जुड़ी पौराणिक कथा।

मां ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार माता ब्रह्मचारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर में हुआ था। नारद जी के उपदेश को सुनकर माता ने भोलेनाथ को अपने पति के रूप में पाने के लिए माता ने कठोर तप किया। माना जाता है कि तपस्या के पहले हजार वर्षों तक माता ने सिर्फ फल और फूल खाकर जीवन बिताया था। इसके बाद सौ वर्षों तक मां केवल जमीन पर रहीं। इसके बाद धूप, वर्षा आदि की परवाह किए बिना माता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या जारी रखी। इसके बाद कई वर्षों तक माता ने केवल बिल्वपत्र खाकर जीवन यापन किया और भगवान शिव की आराधना में लीन रहीं। तपस्या के अंतिम पड़ाव में आते-आते माता ने बिल्वपत्र का त्याग भी कर दिया। माता ने पत्तों का त्याग भी तपस्या के दौरान किया था इसलिए उन्हें अपर्णा भी कहा जाता है। इसके बाद निर्जला रहकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए माता ने तपस्या जारी रखी। माता की कठोर तपस्या को देखते हुए ही इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से पुकारा जाता है। 

माता ब्रह्माचारिणी की तपस्या से प्रसन्न होकर एक ऋषि का रूप बनाकर भगवान शिव माता के पास पहुंचे और माता की परीक्षा ली। हालांकि, ऋषि के रूप में आए भगवान शिव की बात माता ब्रह्माचारिणी ने नहीं सुनी और अपनी तपस्या जारी रखी। तब ऋषि के रूप में आए शिव जी ने उनसे कहा कि शिव तुम्हें पति के रूप में अवश्य मिलेंगे। अंत में भगवान शिव ने माता को पत्नी के रूप में स्वीकार किया और माता ब्रह्मचारिणी की तपस्या सफल हुई। माता ब्रह्मचारिणी तपस्वी, आत्मसंयमी और दृढ़ संकल्प थीं। यही वजह है कि उनकी आराधना वालों को भी संयम और आत्मबल प्राप्त होता है। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

यह भी पढे़ें:

नवरात्रि के दूसरे दिन करें ये उपाय, मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से दूर होगी हर परेशानी, खुशियों से भर जाएगी झोली