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Ganesh Chaturthi Katha: गणेश विनायक चतुर्थी के दिन जरूर पढ़ें ये पावन कथा, तभी व्रत-पूजन का मिलेगा पूर्ण फल

Ganesh Vinayak Chaturthi 2026: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की विनायक चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं और शुभ मुहूर्त में गणपति बप्पा की विधि विधान पूजा करते हैं। साथ ही इस दौरान गणेश जी की कथा भी सुनी जाती है। चलिए जानते हैं गणेश चतुर्थी की पावन कथा के बारे में यहां।

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Image Source : CANVA गणेश चतुर्थी व्रत कथा

गणेश चतुर्थी सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो हर साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। मान्यताओं अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इसी कारण से हर साल इस पवित्र दिन पर भक्त धूमधाम से गणेश जी के जन्म का उत्सव मनाते हैं और पूरे 10 दिनों तक इस उत्सव की धूम रहती है। गणेश चतुर्थी पर कई श्रद्धालु व्रत भी रखते हैं और शुभ मुहूर्त में गणपति भगवान की विधि विधान पूजा करते हैं। साथ ही इस दिन से जुड़ी पावन कथा भी जरूर पढ़ते हैं। ऐसे में यहां हम आपको बताएंगे गणेश चतुर्थी की पावन कथा के बारे में।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

भगवान गणेश जी के जन्म की कथा बहुत ही रोचक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, गणेश जी का जन्म माता पार्वती के संकल्प से हुआ था। कहते हैं एक बार जब माता पार्वती स्नान के लिए जा रही थीं तो उस समय उनके घर के द्वार पर कोई पहरेदार नहीं था जो घर के अंदर आने वालों को रोक सके। तब माता ने अपने शरीर के उबटन यानी मैल से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए। कहते हैं इस प्रकार श्री गणेश जी का जन्म हुआ। फिर माता पार्वती ने बालक गणेश को आदेश दिया कि जब तक वह स्नान कर बाहर न आ जाएं, तब तक अंदर किसी को आने नहीं देना। बालक गणेश माता की आज्ञा मानकर द्वार पर बैठकर पहरा देने लगे।

थोड़ी देर बाद भगवान शिव वहां पहुंचे और अंदर जाने लगे। लेकिन बालक गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। शिव जी ने उन्हें बहुत समझाया कि वह पार्वती के पति हैं उन्हें अंदर जाने के लिए अनुमति की जरूरत नहीं लेकिन गणेश जी अपनी माता की आज्ञा पर अडिग रहे और उन्होंने भोलेनाथ को अंदर नहीं जाने दिया। कई देवी-देवताओं ने गणेश जी को समझाने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने किसी की भी नहीं सुनी। इसके बाद भगवान शिव और बालक के बीच युद्ध छिड़ गया। क्रोध में आकर शिव जी ने अपने त्रिशूल से बालक गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।

जब माता पार्वती बाहर आईं तो अपने पुत्र को मृत देख वह अत्यंत क्रोधित और दुखी हो गईं। उन्होंने पूरी सृष्टि का विनाश करने का संकल्प ले लिया। इससे सभी देवी-देवता भयभीत हो गए। तब माता पार्वती को शांत करने के लिए शिव जी ने बालक को जीवित करने का निर्णय लिया। भगवान शिव ने अपने गणों से कहा कि उत्तर दिशा की तरफ जाओ और जो भी माता अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सोई हो, उस बच्चे का सिर ले आओ। शिव की आदेश पर गण एक सिर की खोज में निकल गए। काफी मशक्कत के बाद गणों को एक हथिनी मिली जो अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सोई थी।

गण उसके बच्चे का सिर ले आए। शिव जी ने वह मस्तक बालक के धड़ पर रखकर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। अपने पुत्र को जीवित देख माता पार्वती प्रसन्न हुईं। इसके बाद शिव जी समेत अन्य सभी देवताओं ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया। साथ भगवान शिव ने कहा कि अब से किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा की जाएगी। इसी कारण भगवान गणेश को 'प्रथम पूज्य' देवता माना जाता है और आज भी हर पूजा-पाठ या शुभ काम की शुरुआत गणेश जी की आराधना से ही होती है। 

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