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Garud Puran: परिवार में किसी की मृत्यु के बाद घर में क्यों नहीं बनाते खाना, गरुड़ पुराण में दिए हैं सूतक के नियम

Garud Puran: गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद चूल्हा न जलाना एक धार्मिक और परंपरागत नियम है। गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद का समय परिवार के लिए सूतककाल माना जाता है। इस दौरान पालन किए जाने नियमों का उद्देश्य आत्मा की शांति, परिवार का शोक और सामाजिक संतुलन बनाए रखना है।

Garud Puran- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV मृत्यु के बाद घर में चूल्हा क्यों नहीं जलाते

Garud Puran Sutak Niyam: गरुड़ पुराण हिंदू धर्म का एक बेहद महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है, जिसमें जीवन, मृत्यु और उसके बाद की आत्मा की यात्रा के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसमें बताए गए नियम और परंपराएं आज भी कई परिवारों में श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण नियम है कि घर में किसी की मृत्यु के बाद कुछ समय तक चूल्हा नहीं जलाया जाता। इसके पीछे धार्मिक, भावनात्मक और स्वास्थ्य से जुड़े कई कारण बताए गए हैं।

गरुड़ पुराण 

गरुड़ पुराण को भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के बीच संवाद के रूप में बताया गया है। इसमें आत्मा, कर्म, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक और मोक्ष जैसे गहरे विषयों की जानकारी दी गई है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद इस ग्रंथ का पाठ करने से आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को जीवन के सत्य को समझने का अवसर मिलता है।

मृत्यु के बाद चूल्हा न जलाने का कारण

गरुड़ पुराण के अनुसार, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद घर में तुरंत सामान्य जीवन शुरू नहीं किया जाता। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि परिवार को शोक मनाने का पूरा समय मिल सके। मान्यता है कि इस दौरान आत्मा अपने घर के आसपास रहती है, ऐसे में घर में चूल्हा जलाना और रोजमर्रा के काम शुरू करना आत्मा की शांति में बाधा माना जाता है।

शोक और सूतक काल की परंपरा

मृत्यु के बाद एक निश्चित अवधि तक सूतक काल माना जाता है, जो आमतौर पर 3 से 13 दिन तक चलता है। इस दौरान कई धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है, जिनमें चूल्हा न जलाना भी शामिल है। यह समय परिवार के लिए मानसिक रूप से संतुलन बनाने और शोक मनाने का होता है।

साफ-सफाई और स्वास्थ्य का महत्व

गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि मृत्यु के बाद घर की साफ-सफाई बेहद जरूरी होती है। अंतिम संस्कार के बाद वातावरण की शुद्धि, कपड़ों की धुलाई और स्नान करना आवश्यक माना गया है। स्वास्थ्य के नजरिए से भी इस दौरान खाना बनाने से बचने की सलाह दी जाती है ताकि स्वच्छता बनी रहे।

सामाजिक और भावनात्मक कारण

इस परंपरा के पीछे एक बड़ा कारण परिवार को समय देना भी है। इस दौरान रिश्तेदार और समाज के लोग भोजन की व्यवस्था करते हैं, जिससे परिवार को सहारा मिलता है। यह परंपरा न सिर्फ धार्मिक है बल्कि भावनात्मक रूप से भी परिवार को संभालने में मदद करती है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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