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कुशा की अंगूठी पहनकर ही क्यों किया जाता है धार्मिक अनुष्ठानों का संकल्प? जानिए इस पवित्र घास का महत्व

कुशा घास भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में खास महत्व रखती है। पूजा-पाठ से लेकर श्राद्ध और तर्पण तक कई धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा का इस्तेमाल किया जाता है। जानिए संकल्प या पूजा के दौरान कुशा से बनी अंगूठी पहनने की का विशेष धार्मिक महत्व क्यों है।

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Image Source : PINTEREST कुशा की पवित्री

सनातन धर्म में पूजा-पाठ से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनके पीछे धार्मिक मान्यताएं और सदियों पुरानी परंपराएं जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक है कुशा की अंगूठी पहनना। आपने अक्सर पूजा, संकल्प, तर्पण के दौरान लोगों को उंगली में कुशा से बनी अंगूठी पहने देखा होगा। आखिर सामान्य सी दिखने वाली इस घास की अंगूठी को इतना पवित्र क्यों माना जाता है, धार्मिक अनुष्ठानों में इसका इस्तेमाल क्यों किया जाता है? आइए जानते हैं कुशा से जुड़ी इस परंपरा और इसके महत्व के बारे में।

क्यों पहनते हैं कुशा की अंगूठी

कुशा को आम घास से अलग और पवित्र वनस्पति माना जाता है। इसकी पत्तियां लंबी, कठोर और धारदार होती हैं। सनातन धर्म की मान्यता में इसे पवित्रता से जोड़ा जाता है। इसका इस्तेमाल पूजा और वैदिक कर्मकांडों में होता आया है। कुशा के तनों से बनाई गई अंगूठी को पवित्री कहा जाता है। 

पूजा, संकल्प, तर्पण और श्राद्ध के दौरान इसे पहनने की परंपरा मिलती है। मान्यता के अनुसार, इसे धारण करने से व्यक्ति का ध्यान अनुष्ठान पर बना रहता है और पवित्रता का भाव कायम रहता है। इसे कुशा के तनों को खास तरीके से मोड़कर तैयार किया जाता है।

पूजा से श्राद्ध तक इस्तेमाल

कुशा का उपयोग केवल अंगूठी बनाने तक सीमित नहीं है। हवन और पूजा के दौरान भी इसका उपयोग होता है। कई धार्मिक विधियों में कुशा को आसन के रूप में बिछाया जाता है और पूजा सामग्री रखने या दूसरी विशेष क्रियाओं में भी इसका प्रयोग होता है। खासतौर पर श्राद्ध और तर्पण में इसका महत्व अधिक है। मार्केट में हैंडमेड और मशीनों से तैयार कई प्रकार के कुशा आसन और मैट भी मिलते हैं। 

पितरों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक

पितृ पक्ष के दौरान तर्पण और श्राद्ध कर्म में कुशा का इस्तेमाल करने की परंपरा का हिस्सा है। इन कर्मों के जरिए पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा निभाई जाती है।

आयुर्वेद में भी उल्लेख

कुशा का उल्लेख कुछ पारंपरिक आयुर्वेदिक और लोक चिकित्सा मान्यताओं में भी मिलता है। इसे शीतल प्रभाव वाली वनस्पति माना गया है और पारंपरिक रूप से इसके कुछ हिस्सों के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है। हालांकि, इसके औषधीय उपयोग को आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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