पितृ पक्ष में पूर्वजों का पिंडदान करना क्यों होता है जरूरी? जान लीजिए इसकी सही विधि और धार्मिक महत्व
पितृ पक्ष में पूर्वजों का पिंडदान करना अत्यंत जरूरी होता है। पिंडदान या श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और पूर्वज प्रसन्न होकर अपने वंशज को आशीर्वाद देते हैं।

पितृ पक्ष पितरों को समर्पित होता है। पितृ पक्ष में पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है। समयानुसार पितरों का श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा से मनुष्य आयु, पुत्र, यश, कीर्ति, स्वर्ग, पुष्टि, बल, श्री, सुख-सौभाग्य और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी माना जाता है।
बता दें कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल और पितृकुल दोनों की पहले पीढ़ियों के गुणसूत्र उपस्थित होते हैं। चावल के पिंड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, उन्हें आपस में मिलाकर फिर अलग बांटते हैं। जिन-जिन लोगों के गुणसूत्र (जीन्स) श्राद्ध करने वाले की देह में हैं, उन सबकी तृप्ति के लिएयह अनुष्ठान किया जाता है।
पिंडदान की विधि
पिंडदान दाहिने हाथ में लेकर करना चाहिए और मंत्र के साथ पितृतीर्थ मुद्रा से दक्षिणाभिमुख होकर पिंड किसी थाली या पत्तल में स्थापित करें। पितृतीर्थ मुद्रा में दक्षिण दिशा में मुख करके बायां घुटना मोड़कर बैठा जाता है। इसके बाद 12 पिंड निकाले जाते हैं। ये सभी 12 पिंड अलग-अलग दिवंगत आत्माओं के लिए निकाला जाता है, जिसके बारे में यहां बताया गया है।
- पहला पिंड- देवताओं के लिए
- दूसरा पिंड- ऋषियों के लिए
- तीसरा पिंड- दिव्य मानवों के लिए
- चौथा पिंड- दिव्य पितरों के लिए
- पांचवां पिंड- यम के लिए
- छठा पिंड- मनुष्य-पितरों के नाम
- सातवां पिंड- मृतात्मा के नाम
- आठवां पिंड- पुत्रदारा रहितों के नाम
- नौवां पिंड- उच्छिन्न कुलवंश वालों के नाम
- दसवां पिंड- गर्भपात से मर जाने वालों के नाम
- ग्यारहवां और बारहवां पिंड- इस जन्म या अन्य जन्म के बंधुओं के निमित
इस तरह से बारह पिंड निकाले जाते हैं और उन पर क्रमशः दूध, दही और मधु चढ़ाकर पितरों से तृप्ति की प्रार्थना की जाती है और मंत्र का जप किया जाता है। मंत्र है- ऊं पयः पृथ्वियां पय ओषधीय, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम।। गरुड़ पुराण के हवाले से श्री कृष्ण का वचन उद्घृत है- कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति। आयुः पुत्रान्यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।। पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्। देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।। देवताभ्यः पितृणां हिपूर्वमाप्यायनं शुभम्।।
पितृ पक्ष में श्राद्ध का धार्मिक महत्व
श्राद्ध के दिन पितरों के निमित खीर, पूड़ी, सब्जी और साथ ही उनके पितर की कोई मनपसंद चीज और एक अन्य सब्जी बनाई जाती है। फिर इस भोजन को गोबर से बने उपले या कंडलों की कोर पर रखकर पितरो को भोग लगाया जाता है और सीधे हाथ से कोर के दाहिनी तरफ पानी छोड़ा जाता है। इसे ही पिंडदान कहा जाता है। लेकिन कुछ शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिण्ड बनाए जाते हैं और उसे सपिण्डीकरण कहते हैं। यहां पिण्ड का अर्थ है- शरीर। श्राद्ध में पूर्वज़ों के निमित पिंड बनाकर उनसे अपने आने वाले जीवन की शुभेच्छा की प्रार्थना की जाती है। पिण्डदान करने वाले को उसके पूर्वज़ों के आशीर्वाद से संतति, संपत्ति, विद्या और हर प्रकार की सुख-समृद्धि मिलती है।
श्राद्ध में कौओं के लिए भोजन जरूर निकालें?
कौवों को पितृ का प्रतीक माना जाता है। श्राद्ध में कौओं को भोजन खिलाने या उनके निमित भोजन निकालने से पितरों को खाना मिलता है, उनकी तृप्ति होती है- ऐसा माना जाता है । इसलिए श्राद्ध में कौओं के नाम का भोजन जरूर निकालना चाहिए। पितृ पक्ष के प्रथम दिन पहला न्योता, दूसरा पूर्वज की मृत्यु की तिथि पर, तीसरा आमंत्रण नवमी तिथि और अंतिम बार पितृ विसर्जन कौओं को आमंत्रित कर भोजन कराने की या उनके निमित भोजन निकालने की परंपरा है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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