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Sheetala Ashtami Vrat Katha: शीतला अष्टमी पर जरूर करें इस कथा का पाठ, वरना अधूरा रह जाएगा व्रत का फल

Sheetala Ashtami Vrat Katha: शीतला माता की पूजा के दौरान शीतला अष्टमी व्रत की कथा सुनने का विशेष महत्व बताया गया है। यह कथा हमें बताती है कि नियमों की अनदेखी से संकट आ सकता है, लेकिन सच्ची सेवा और भक्ति से माता की कृपा मिलती है। यहां पढ़िए शीतला अष्टमी की संपूर्ण कथा।

शीतला अष्टमी व्रत कथा- India TV Hindi
Image Source : FILE IMAGE शीतला अष्टमी व्रत कथा

Sheetala Ashtami Vrat Katha: शीतला अष्टमी का पर्व हिंदू धर्म में विशेष आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। साल 2026 में यह 10 अप्रैल को पड़ रहा है। माता शीतला को आरोग्य और रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, पूजा करते हैं और खासतौर पर व्रत कथा सुनते हैं, क्योंकि मान्यता है कि कथा के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। यह कथा हमें नियमों का पालन और सेवा भाव का महत्व भी सिखाती है। शीतला अष्टमी के दिन इस कथा का पाठ जरूर करें। 

शीतला अष्टमी व्रत कथा

एक गांव में एक ब्राह्मण परिवार रहता था, जिसमें एक बुजुर्ग दंपत्ति, उनके दो बेटे और दो बहुएं थीं। दोनों बहुओं के दो-दो बच्चे थे और पूरा परिवार प्रेम से रहता था।

जब शीतला अष्टमी का दिन आया, तो सास ने बहुओं को व्रत के नियम समझाए। उन्होंने बताया कि इस दिन ताजा भोजन नहीं बनाया जाता, बल्कि एक दिन पहले बना हुआ बासी भोजन ही ग्रहण किया जाता है। यह व्रत का मुख्य नियम माना जाता है।

बहुओं ने सास की बात तो सुन ली, लेकिन उन्हें अपने छोटे बच्चों की चिंता होने लगी। उन्हें लगा कि बासी भोजन से बच्चों की तबीयत खराब हो सकती है। इसलिए उन्होंने सास से छिपकर बच्चों के लिए ताजा भोजन बना दिया और उन्हें खिला दिया। इसके बाद वे माता शीतला की पूजा करने मंदिर चली गईं।

जब वे पूजा करके वापस लौटीं, तो देखा कि उनके बच्चे मृत अवस्था में पड़े हैं। यह देखकर दोनों बहुएं दुख से टूट गईं और जोर-जोर से रोने लगीं।

सास ने क्रोधित होकर कहा कि व्रत के नियम तोड़ने के कारण ही माता शीतला नाराज हुई हैं। उन्होंने बहुओं से कहा कि जब तक वे अपने बच्चों को जीवित नहीं कर लेंगी, तब तक घर वापस न आएं।

दुखी होकर दोनों बहुएं अपने बच्चों को लेकर घर से निकल पड़ीं और भटकती रहीं। रास्ते में उन्हें एक पेड़ के नीचे दो बहनें मिलीं, जो गंदगी और जुओं से परेशान थीं। अपने दुख को भूलकर बहुओं ने उनकी मदद करने का फैसला किया और उनके सिर से जुएं साफ करने लगीं।

बहनों की सेवा से प्रसन्न होकर उन्होंने बहुओं को आशीर्वाद दिया। तभी माता शीतला प्रकट हुईं और बोलीं कि सच्चे मन से सेवा और आशीर्वाद के प्रभाव से वे उनके बच्चों को जीवनदान देती हैं।

माता के आशीर्वाद से बच्चे जीवित हो गए। बहुएं खुश होकर घर लौटीं और इस बार पूरे विधि-विधान से व्रत और पूजा की। उन्होंने संकल्प लिया कि आगे से कभी भी नियमों की अनदेखी नहीं करेंगी।

इसके बाद उनके जीवन में सुख और समृद्धि आ गई और पूरे गांव में शीतला अष्टमी की महिमा और भी बढ़ गई।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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