RPG ग्रुप के चेयरमैन और उद्योगपति हर्ष गोयनका ने महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) के आयुक्त आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंडे को ‘शाम का हीरो’ करार दिया है। गोयनका ने एक कार्यक्रम में मुंडे से पहली बार मुलाकात के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी भावनाएं साझा कीं। इसके जवाब में मुंडे का विनम्र और सामूहिक सेवा पर जोर देने वाला बयान अब चर्चा का विषय बन गया है।
हर्ष गोयनका ने एक्स पर की तारीफ
बिजनेसमैन हर्ष गोयनका ने लिखा, “मैं पहली बार तुकाराम मुंढे से मिला और वे निस्संदेह उस शाम के हीरो थे। हर कोई उनसे मिलना चाहता था। क्यों? क्योंकि वे वही कर रहे हैं जिसकी उम्मीद नागरिकों को अपने सिविल सर्वंट्स से होती है। खाद्य मिलावट, असुरक्षित रसोइयों और शक्तिशाली प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं।” हर्ष गोयनका ने आगे सवाल उठाया, “यह उल्लेखनीय है कि एक अधिकारी जो बस ईमानदारी और दृढ़ विश्वास के साथ अपना काम कर रहा है, वह लोगों का हीरो बन जाता है। लेकिन यह बड़े सिविल सर्विसेज पर कितना बुरा प्रभाव डालता है, जहां ऐसे उदाहरण इतने कम हैं?”
IAS अधिकारी ने पोस्ट पर दिया जवाब
तुकाराम मुंढेत्र ने गोयनका के पोस्ट का जवाब देते हुए व्यक्तिगत श्रेय लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने लिखा, “पब्लिक सर्विस कभी भी किसी व्यक्ति के बारे में नहीं होती। यह ईमानदारी, साहस और दृढ़ विश्वास के साथ नागरिकों की सेवा करने की सामूहिक प्रतिबद्धता के बारे में है। देश भर में अनगिनत सिविल सर्वंट्स हैं जो अनुकरणीय काम कर रहे हैं, शायद मुझसे भी बेहतर, लेकिन उनके प्रयासों को वह मान्यता शायद ही मिलती है जिसके वे हकदार हैं।” मुंढे ने आगे कहा, “मैं इस साझा उद्देश्य की दिशा में काम कर रही बहुत बड़ी टीम का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा हूं। जो भी हम हासिल करते हैं, वह हमेशा सामूहिक प्रयास होता है। नागरिकों का विश्वास और अपेक्षाएं हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी हैं। ईमानदार, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित सार्वजनिक सेवा कभी भी अपवाद नहीं होनी चाहिए। यह नॉर्म होनी चाहिए।”
तुकराम मुंढे के बारे में जानें
अफसर की विनम्रता को मिले लाइक्स
यह जवाब सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से सराहा जा रहा है। कई यूजर्स ने तुकाराम मुंढे की विनम्रता और सामूहिक दृष्टिकोण की प्रशंसा की है। लोग कह रहे हैं कि ऐसे अधिकारी सिर्फ कार्रवाई से नहीं, बल्कि अपनी सोच से भी मिसाल पेश करते हैं। हर्ष गोयनका का सवाल भी कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि ईमानदार और निर्भीक अधिकारियों के उदाहरण क्यों इतने दुर्लभ माने जाते हैं।
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