1. Hindi News
  2. वायरल न्‍यूज
  3. 'अमीर भारतीय पैरेंट्स अपने Gen Z बच्चों को आलसी और बेरोजगार बना रहे!' शख्स की पोस्ट पर छिड़ी बहस

'अमीर भारतीय पैरेंट्स अपने Gen Z बच्चों को आलसी और बेरोजगार बना रहे!' शख्स की पोस्ट पर छिड़ी बहस

सोशल मीडिया पर एक शख्स की वायरल पोस्ट पर जमकर ​बहस हो रही है। इसमें उसने दावा किया था कि, 'अमीर भारतीय पैरेंट्स अपने Gen Z बच्चों को आलसी और बेरोजगार बना रहे हैं।'

Gen Z Kids Viral Post, Indians making gen z kids lazy, gen z, Indian parents- India TV Hindi
Image Source : PEXELS बच्चे हो रहे आलसी। (प्रतीकात्मक फोटो)

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वायरल पोस्ट ने जोरदार बहस छेड़ दी है। वैल्यू इन्वेस्टर और फाइनेंशियल एडवाइजर प्रेम सोनी ने दावा किया है कि हाई नेट वर्थ इंडिविजुअल्स (HNI) यानी अमीर भारतीय माता-पिता अपने Gen Z बच्चों को पैसिव इनकम और अत्यधिक आराम देकर बेरोजगार और आलसी बना रहे हैं। उनके अनुसार, माता-पिता सोचते हैं कि वे परिवार का भविष्य सुरक्षित कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में वे एक पूरी पीढ़ी को बेरोजगार और सुस्त बना रहे हैं। 

एक्स पर शेयर ​की गई पोस्ट 

इस पोस्ट को एक्स पर @ValueWithPrem नामक हैंडल से शेयर किया गया है। पोस्ट में उन्होंने टियर-1 और टियर-2 शहरों के करीब 25 साल के कई Gen Z युवाओं का जिक्र किया, जो ‘अल्टीमेट वेल्थ डिलेमा’ में फंसे हुए हैं। एक्स यूजर के अनुसार ये युवा तीन मुख्य जालों में उलझे हैं, जो कि इस प्रकार हैं 

  • ईगो ट्रैप (अहंकार का जाल): ये युवा ब्लू-कॉलर जॉब, सेल्स या ग्राउंड-लेवल की नौकरियां लेने से इनकार करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे परिवार की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी। अमीर परिवार से आने के कारण वे ऐसी नौकरियों को अपनी सामाजिक स्थिति के नीचे समझते हैं। 
  • लाइफस्टाइल ट्रैप (जीवनशैली का जाल): एंट्री-लेवल कॉरपोरेट जॉब में करीब 30,000 रुपये मासिक वेतन उन्हें पर्याप्त नहीं लगता। उनकी मौजूदा लाइफस्टाइल—कैफे में बैठना, फ्यूल का खर्च, वीकेंड ट्रिप—माता-पिता के पैसे से चल रही होती है। इतना वेतन इस खर्च को कवर नहीं कर पाता, इसलिए वे ऐसी नौकरियां ठुकरा देते हैं। 
  • एंटाइटेलमेंट ट्रैप (अधिकार का जाल): ये युवा पारंपरिक पारिवारिक बिजनेस संभालने से भी कतराते हैं, क्योंकि उन्हें वो ‘बोरिंग’ या ‘एस्थेटिक’ नहीं लगता। परिवार की संपत्ति बनाने वाले उस बिजनेस को वे अपनी पसंद की लाइफस्टाइल के अनुकूल नहीं मानते। कुछ युवा मज़दूरी और बिक्री संबंधी नौकरियों से बचते हैं क्योंकि उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि उनके परिवार और दोस्तों के सामने ऐसी नौकरियों को कैसे देखा जाएगा। उनके अनुसार, पारिवारिक व्यवसाय को संभालना भी हमेशा आकर्षक विकल्प नहीं माना जाता है।

पैरेंट्स को ठहराया जिम्मेदार 

फाइनेंशियल एडवाइजर Gen Z बच्चों के इस रवैये के लिए पैरेंट्स को जिम्मेदार मानते हैं। वे कहते हैं कि, 'इसके लिए माता-पिता पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। आरामदायक जीवन प्रदान करने और बच्चों को निष्क्रिय आय दिलाने के उनके जुनून ने परिवार की सक्रिय महत्वाकांक्षा को पूरी तरह से खत्म कर दिया है।' भारतीय माता-पिता बच्चों को शहर छोड़कर संघर्ष करने नहीं देते। उनका तर्क होता है- 'यहां पिता काफी कमा रहे हैं, तो क्यों बाहर जाएं?' जबकि अमेरिका में बच्चों को स्वतंत्र होने और सर्वाइवल स्किल्स सीखने के लिए घर से बाहर धकेला जाता है। भारत में हम बच्चों को आराम से घोंट रहे हैं।  

यूजर्स के बीच छिड़ी बहस 

इससे सोशल मीडिया पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आईं। कुछ यूजर्स सहमत हुए कि अत्यधिक सुरक्षा और आराम बच्चों में जिम्मेदारी, रेजिलिएंस और वर्क एथिक को कमजोर कर सकता है। वहीं, कुछ लोगों के विरोध में भी अपनी प्रतिक्रिया दी। एक यूजर ने लिखा कि, 'पीढ़ी दर पीढ़ी संपत्ति का होना बेहद जरूरी है... बच्चों को कुछ भी नहीं करना चाहिए... किराए से आमदनी होनी चाहिए। जीवन का आनंद लेना चाहिए, काम करके खुद को खत्म नहीं करना चाहिए। अंत में, खुशहाल जीवन जीना ही महत्वपूर्ण है।'

दूसरे यूजर ने लिखा कि, 'अगर माता-पिता के पास 500 करोड़ से अधिक की संपत्ति है तो इसमें क्या गलत है? आप अपने बच्चे को कॉर्पोरेट राजनीति या व्यवसाय में क्यों धकेलना चाहते हैं जहाँ नौकरशाहों और बीएमसी अधिकारियों की चापलूसी करनी पड़ती है? जीवन का आनंद क्यों न लें और रचनात्मक कार्य करें या अपने शौक को आगे बढ़ाएं, क्योंकि आय का तो इंतजाम हो ही चुका है?'

तीसरे यूजर ने लिखा कि, 'लाड-प्यार वास्तव में आज की पीढ़ी को बर्बाद कर रहा है। माता-पिता को उन्हें हर चीज़ (पैसे सहित) का महत्व सिखाना चाहिए, इससे उन्हें भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।'

चौथे यूजर ने लिखा कि, 'आराम से प्रेरणा/इनोवेशन खत्म हो जाता है। यह एक बड़ी आपदा का संकेत है। ये बच्चे लंबे समय तक दुखी रहेंगे, क्योंकि मूल रूप से मनुष्य को खुशी के लिए सफलता की आवश्यकता होती है और पैसा आराम तो खरीद सकता है, लेकिन संतुष्टि नहीं।' 

डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।

ये भी पढ़ें -
'मैं केवल सोने के लिए घर आता हूं...' मुंबई में ₹35,000 कमाने वाले एम्प्लॉई का ट्रैवल रूटीन हुआ वायरल