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सुप्रीम कोर्ट में महुआ मोइत्रा की PIL पर तीखी बहस, अदालत ने पूछा- सांसद होते हुए संसद की बजाय कोर्ट क्यों आईं?

सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि सांसद होने के नाते उन्होंने संसद में आवाज उठाने के बजाय कोर्ट का रुख क्यों किया। जानिए पूरी खबर।

Bengal News- India TV Hindi
Image Source : PTI सुप्रीम कोर्ट में महुआ मोइत्रा की PIL पर तीखी बहस

भारतीय शेयर बाजार में विदेशी फंड्स और अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) के नियमन को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा की तरफ से दायर की गई जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प और तीखी बहस देखने को मिली। अदालत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की कानूनी स्थिति और संसद के बजाय सीधे अदालत आने के औचित्य पर कई गंभीर सवाल खड़े किए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा संसद में क्यों नहीं उठाया मुद्दा?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा कि एक सांसद होने के नाते महुआ मोइत्रा को जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? अदालत ने टिप्पणी की कि यदि इस विषय पर कोई नीतिगत या गंभीर चर्चा करानी है, तो सांसद के पास संसद का मंच सबसे प्रमुख होता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आम नागरिकों और एक जन प्रतिनिधि (सांसद) की न्याय तक पहुंच के दायरे में अंतर होता है, क्योंकि सांसदों के पास अपनी बात और असंतोष प्रकट करने के अन्य माध्यम भी होते हैं।

प्रशांत भूषण की दलीलें: 'सांसद होने से नागरिकों के अधिकार कम नहीं होते'

पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट में दलील दी कि याचिकाकर्ता देश की एक आम नागरिक भी हैं। उन्होंने तर्क दिया कि महुआ मोइत्रा पूर्व में वित्तीय क्षेत्र में काम कर चुकी हैं, इसलिए उन्हें इस विषय की गहरी और तकनीकी जानकारी है।

प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का भारतीय बाजार में लगभग 100 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश है। ऐसे में इन फंडों के वास्तविक मालिकों की जानकारी सार्वजनिक होना बेहद जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व में अडानी समूह के शेयरों में निवेश करने वाले कुछ फंड्स के असली मालिकों का पता लगाने में सेबी (SEBI) को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य देश के छोटे और खुदरा निवेशकों के हितों की सुरक्षा करना है।

सॉलिसिटर जनरल का पलटवार

केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रशांत भूषण की दलीलों को मात्र एक राजनीतिक बयान करार दिया। उन्होंने अदालत को बताया कि जिन मुद्दों को इस याचिका में उठाया जा रहा है, उन पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की जा चुकी विशेष समिति द्वारा विचार किया जा चुका है। जब कोर्ट ने यह बिंदु उठाया कि जिन निवेशकों के हितों की रक्षा का दावा किया जा रहा है, वे स्वयं अदालत के सामने पक्ष रखने क्यों नहीं आए, तो प्रशांत भूषण ने जवाब दिया कि महुआ मोइत्रा स्वयं भी एक निवेशक हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि यह मामला किसी निजी निवेश के हितों से जुड़ा हुआ है, तो इसे जनहित याचिका (PIL) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब आगे की कानूनी कार्यवाही पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।

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