दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की नेहा बोरा की याचिका, कहा- कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त जानकारी और दस्तावेज मौजूद थे
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को दिल्ली हाईकोर्ट से झटका लगा है। हाईकोर्ट ने नेहा बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस द्वारा SEM के समक्ष पीस बॉन्ड भरने के नोटिस के खिलाफ अपील की थी।

छात्र संगठन AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने नेहा बोरा की याचिका को खारिज कर दिया है। बता दें कि नेहा ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10 हजार रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही रकम का एक जमानती देने के बारे में जवाब देने को कहा गया था। हालांकि, नेहा बोरा की याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने ये भी कहा है कि उन्होंने मजिस्ट्रेट के लिए कुछ निर्देश जारी किए है।
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की अदालत ने कहा कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने नेहा के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त जानकारी और दस्तावेज मौजूद थे। ऐसे में इस शुरुआती स्तर पर हाईकोर्ट के दखल देने का कोई आधार नहीं बनता।
छह FIR और तीन जनरल डायरी एंट्री का जिक्र
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड के मुताबिक, नेहा से जुड़े छह FIR दर्ज हैं। इसके अलावा पुलिस की तीन जनरल डायरी एंट्री और दूसरे दस्तावेज भी मजिस्ट्रेट के सामने रखे गए थे। अदालत ने कहा कि इन रिकॉर्ड में अलग-अलग जगहों और तारीखों पर हुई घटनाओं का जिक्र है। कोर्ट ने यह भी कहा कि नेहा को नोटिस जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिपोर्ट और दूसरे दस्तावेज देखे थे। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि कार्रवाई सिर्फ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर की गई।
मंडी हाउस में प्रदर्शन से जुड़ा है मामला
मामला 16 अक्टूबर को दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में प्रदर्शन से जुड़ा है। नेहा बोरा ने सोशल मीडिया पर लोगों को शाम पांच बजे मंडी हाउस पहुंचने की अपील की थी। इसके बाद वह करीब 40 से 50 प्रदर्शनकारियों के साथ वहां पहुंचीं। पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को धारा 163 के तहत लागू पाबंदियों के बारे में लाउडस्पीकर से चेतावनी दी गई थी। पुलिस का आरोप है कि चेतावनी के बावजूद प्रदर्शनकारी आगे बढ़ते रहे और नारे लगाए। पुलिस ने नेहा को हिरासत में लिया था और अगले दिन उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बाद 17 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने उन्हें नोटिस जारी किया।
नेहा के वकील ने क्या दलील दी?
नेहा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने अदालत में कहा कि नोटिस जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट ने अपने स्तर पर जरूरी जांच नहीं की। उनका कहना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपने आप में शांति भंग होने का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी दलील दी कि नोटिस में दी गई जानकारी पर्याप्त नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने पुलिस की रिपोर्ट के साथ दूसरे दस्तावेज भी रखे गए थे। उनके मुताबिक, इन दस्तावेजों के आधार पर मजिस्ट्रेट ने कार्रवाई शुरू करने का फैसला लिया था।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने साफ किया कि इस तरह की कार्रवाई का मकसद किसी व्यक्ति को सजा देना नहीं, बल्कि शांति भंग होने की आशंका को रोकना है। अदालत ने कहा कि नोटिस जारी होने के शुरुआती चरण में उसका काम यह देखना है कि मजिस्ट्रेट के सामने कोई जानकारी या दस्तावेज थे या नहीं और उन्होंने उन पर विचार किया या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि नोटिस को किसी फैसले की तरह विस्तार से लिखना जरूरी नहीं है। हालांकि, अदालत ने पुलिस और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि नेहा को उन सभी दस्तावेजों की जानकारी दी जाए, जिनके आधार पर नोटिस जारी किया गया है और जिन पर आगे की जांच के दौरान भरोसा किया जाएगा। अदालत ने मजिस्ट्रेट को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि नेहा को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिले और उनके अधिकारों का ध्यान रखा जाए।
बोरा की याचिका मेंटेनेबल नहीं- दिल्ली पुलिस
बता दें कि इससे पहले गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने नेहा बोरा के वकील और पुलिस की दलीलें लगभग तीन घंटे तक सुनने के बाद, याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। याचिका का विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा था कि नेहा बोरा की याचिका मेंटेनेबल नहीं है। अब शुक्रवार की शाम को फैसला सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने नेहा बोरा की याचिका को खारिज कर दिया है।
नेहा ने क्या अपील की थी?
आपको बता दें कि नेहा बोरा को BNSS की धारा 126 के तहत 17 अक्टूबर को नोटिस जारी किया गया था। इस नोटिस में नेहा बोरा से कहा गया कि वह 19 अक्टूबर को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने पेश हों और कारण बताएं कि ''जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए'' उनसे 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड और एक जमानतदार क्यों न लिया जाए। इसके बाद नेहा बोरा ने इस नोटिस को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और इस नोटिस को रद्द करने और पुलिस को यह निर्देश देने का अनुरोध किया था कि उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
PTI के मुताबिक, BNSS की धारा 126 के तहत SEM को अधिकार है कि वह ऐसे बॉण्ड पर साइन करवा सके। हालांकि, इस बारे में विश्वसनीय जानकारी होनी चाहिए कि कोई व्यक्ति (जिससे बॉन्ड भरवाना हो) शांति भंग कर सकता है, सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डाल सकता है, या कोई ऐसा गलत काम कर सकता है जिससे अशांति पैदा हो सकती है।
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