नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर खतरनाक है, स्थिति बिगड़ने पर ही दिखते हैं ये लक्षण

पिछले कुछ सालों में नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर की बीमारी युवाओं में तेजी से पनप रही है। इसे मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) या नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) के नाम से जाना जाता है। खतरनाक बात ये है कि इस बीमारी के लक्षण कई सालों तक बीमारी के बढ़ने पर ही नजर आते हैं।
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पिछले कुछ सालों में नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर की बीमारी युवाओं में तेजी से पनप रही है। इसे मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) या नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) के नाम से जाना जाता है। खतरनाक बात ये है कि इस बीमारी के लक्षण कई सालों तक बीमारी के बढ़ने पर ही नजर आते हैं।
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शारदा हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉ भुमेश त्यागी ने बताया कि लिवर मौन रहने और बहुत सहने वाला अंग है, जब स्थिति लिवर के कंट्रोल से बाहर हो जाती है तभी इसके लक्षण दिखाई देते हैं। डॉक्टर नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर को 'साइलेंट लिवर डिजीज' मानते हैं। मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज में लिवर में बहुत अधिक फैट जमा होने लगता है। शुरुआत में ये फैटी लिवर और फिर सूजन और लिवर-कोशिका क्षति से जुड़ी गंभीर स्थिति में पहुंच सकता है।
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शुरुआत में साधारण फैटी लिवर (स्टीटोसिस) की तरह दिखने वाली स्थिति पैदा होती है। इस स्थिति में आपको थकान, पेट में बेचैनी, सूजन और बिना किसी वजह से वजन में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। अगर ऐसे लक्षण दिखाई दें तो इन्हें तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। लंबे समय तक इन लक्षणों को नज़रअंदाज करने से लिवर में घाव और यहां तक ​​कि लिवर फेलियर भी हो सकता है।
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स्टीटोसिस का कारण खराब लाइफस्टाइल को माना जा रहा है। चयापचय संबंधी विकार, डिस्लिपिडेमिया यानि शरीर में लिपिड का असंतुलन बिगड़ने, मोटापा, इंसुलिन प्रतिरोध और टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियों से पीड़ित लोगों में इसका खतरा ज्यादा रहता है। लाइफस्टाइल में खान-पान की आदतों, हाई कैलोरी इनटेक, खराब नींद के पैटर्न, तनाव और फिजिकल एक्टिविटी कम होने के कारण होती है।
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हेल्दी खाना, नियमित व्यायाम या किसी भी तरह की फिजिकल एक्टिविटी को अपनी दिनचर्या में शामिल करने, ब्लड शुगर को कंट्रोल करने, शराब और कुछ हानिकारक दवाओं से परहेज करने, धूम्रपान छोड़ने और लिपिड प्रोफाइल को ध्यान में रखते हुए, नियमित हेल्थ चेकअप करवाते हुए इसके खतरे को कम किया जा सकता है।