पुत्र सपुत्र भी और कपुत्र भी-
प्रिय शिष्य और पुत्र को ज्यादा लाड़ नहीं करना चाहिए क्योंकि ज्यादा लाड़ करने से वो दुष्ट और धमकाने से सोने के समान उज्जवल संत बन जाते हैं। वहीं सुपुत्र और कुपुत्र पर अपनी बात रखते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि सुपुत्र और सुगंध वाले वृक्ष की एक ही दशा होती है, जिस प्रकार एक सुगंधित वृक्ष अपनी गंध से सारे वन को सुगंधित कर देता है उसी प्रकार एक सुपुत्र सारे कुल को प्रसिद्ध कर देता है।
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