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ढाका हमला: जब धार्मिक हैवानियत के बीच ज़िंदा रही इंसानियत

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुए आतंकी हमले में किसी ने अपनी बेटी खोई, मां ने बेटा खोया तो किसी के दोस्त का बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। मज़हब के नाम पर बैवानियत का

Ishrat

इन्ही बहादुरों में शामिल हैं इशरत अखोंड जिन्हें आतंकियों ने बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। 45 साल की इशरत ढाका में ही एक कंपनी में human resources director थी और फ़ैशन डिज़ायनर थी। इशरत को भी आय़तें आती थी लेकिन उन्होंने धर्म का फायदा उठाना मुनासिब नहीं समझा..इशरत ने आय़त पढ़ने से इनकार कर दिया इसके आतंकी नाराज़ हो गए। उनकी नाराज़गी तब और बढ़ गई जब उन्होंने देखा कि इशरत ने हिजाब नहीं पहना था..इससे नाराज़ आतंकियों ने इशरत का का भी गला रेत दिया।

फराज़, अंबिता कबीर और इशरत ने अपनी जान दे दी लेकिन उन्होंने धर्म को ढाल नहीं बनाया, वो इन आतंकियों के सामने नहीं झुके। इन्होंने ये साबित कर दिया कि इस्लाम वो नहीं है जो बेकसूरों की जान ले बल्कि इस्लाम वो है जो मुसीबत की घड़ी में अपने दोस्तों के साथ खड़ा होना सिखाता है।

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