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एम्स के कमरे में किसने बनाया राजीव गांधी को PM? जानिए

नई दिल्ली: इतिहास में कई वाकये ऐसे होते हैं, जहां सच्चाई परदे में रहती है और तरह-तरह के कयास सत्ता के गलियारों में तैरते रहते हैं। ऐसा ही एक राजनीतिक कयास है कि इंदिरा गांधी

narsimha rao

बाबरी कांड पर नरसिम्हा राव के रोल पर सवाल

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब - द टर्बुलेंट इयर्स - में 1992 की बाबरी मस्जिद गिराए जाने की घटना का ज़िक्र करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को कटघरे में खड़ा किया है। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि उन्होंने इस घटना पर नरसिम्हा राव से कड़ी नाराज़गी जताई थी। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ तो देश के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे। इस घटना के वक्त प्रणब मुखर्जी योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे।

अपनी किताब 'द टर्बुलेंट इयर्स - 1980-1996' में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी लिखते हैं- ‘बाबरी मस्जिद को टूटने से नहीं रोक पाना पीवी नरसिम्हा राव की सबसे बड़ी नाकामी थी। उन्हें इस मुश्किल काम को लेकर दूसरी राजनीतिक पार्टियों से बातचीत करनी चाहिए थी।’

प्रणब मुखर्जी आगे लिखते हैं- ‘बाद में पीवी नरसिम्हा राव के साथ मेरी मीटिंग हुई। उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं था। मैं उन पर टूट पड़ा। मैंने कहा कि क्या आपको किसी ने इसके ख़तरों से आगाह नहीं कराया? क्या आप बाबरी विध्वंस के ग्लोबल प्रभाव का अंदाज़ा लगा सकते हैं। कम से कम अब आपको सांप्रदायिक तनाव को ख़त्म करने के लिए कदम उठाना चाहिए।’

सीताराम केसरी जैसे नेताओं के रोने की घटना को दिया ड्रामेबाज़ी करार

अकसर कहा जाता है कि अयोध्या विवाद के वक्त पीवी नरसिम्हा राव को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए था लेकिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस तर्क से इत्तेफ़ाक नहीं रखते। अपनी किताब में वो लिखते हैं कि संविधान की धारा 356 के तहत उत्तर प्रदेश सरकार को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए था, जो आसान नहीं था। एक चुनी हुई सरकार को बर्ख़ास्त करना आसान नहीं होता। बाबरी कांड के बाद कैबिनेट मीटिंग में सीताराम केसरी जैसे नेताओं के रोने की घटना को प्रणब मुखर्जी ड्रामेबाज़ी करार देते हैं।

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