नई दिल्ली: आज विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस है। प्रत्येक वर्ष ’16 अक्टूबर’ को यह मनाया जाता है लेकिन वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक में भारत ब्रिक्स देशों में सबसे निचले पायदान पर है। बेशक देश में गरीबी घटी है लेकिन अब भी करीब एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, इसलिए सबको खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कराना एक बड़ी चुनौती है।
इस दिवस को मनाते हुए 32 वर्ष हो चुके है लेकिन दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह संख्या दिनोंदिन तेजी से बढ़ती जा रही है। दुनिया में एक तरफ तो ऐसे लोग हैं, जिनके घर में खाना खूब बर्बाद होता है और फेंक दिया जाता है। वहीं, दूसरी तरफ ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जिन्हें एक समय का भोजन तक नहीं मिल पाता। खाद्यान्न की इसी समस्या को देखते हुए हर साल ’16 अक्टूबर’ को ‘विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस’ मनाने की घोषणा की गई थी।
भुखमरी से पार पाना भारत के लिए बड़ी चुनौती
कहते हैं दुनियाभर में भारत की गरीबी बिकती है। लेकिन अब तो भूख भी बिकेगी क्योंकि यहां भूखों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। दुनिया में भुखमरी के शिकार जितने लोग हैं, उनमें से एक चौथाई लोग सिर्फ भारत में रहते है। भारत के लिए यह शर्मनाक खबर है क्योंकि भुखमरी के मामले में हमारे हालात पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे मुल्कों से भी कहीं ज्यादा खराब हैं।
भुखमरी मापने वाले सूचकांक ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI), 2015 के आंकड़ों को देखे तो इसमें भारत 68वें स्थान पर है। जबकि रूस 43वें, चीन 42वें, ब्राजील 36वें, और दक्षिण अफ्रीका 41वें स्थान पर है। वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक में भारत की यह रैंकिंग सरकार के उन सारे दावों को नकारती है, जो विकास का दावा करते है।
विश्वभर में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे है और 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय है। अफसोस तो ये है कि दुनिया भर में निर्यात करने वाले देश में ही 30 करोड़ गरीब जनता भूखी सोती है। एक तरफ देश में भुखमरी है वहीं हर साल सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है।
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