'गलवान ने दिखा दिया भारत-चीन सीमा विवाद का सैन्य समाधान अब संभव नहीं', पूर्व आर्मी चीफ नरवणे का बड़ा बयान
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने कहा कि चीन के साथ जिन इलाकों में सीमा को लेकर असहमति है, वहां झड़पें जारी रहेंगी। उन्होंने गलवान की झड़प को ऐसी ही एक घटना का उदाहरण बताया।

भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा है कि गलवान झड़प के बाद की घटनाओं से यह साफ हो गया कि चीन के साथ सीमा विवाद का कोई सैन्य समाधान संभव नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि इस घटना ने बातचीत और संवाद के जरिए इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिशों को नई गति दी है। नरवणे ने कहा कि चीन के साथ हमारी सीमा का मसला अभी सुलझा नहीं है। मैं जानबूझकर 'बाउंड्री' (सीमा) शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि एक 'इंटरनेशनल बॉर्डर' के विपरीत- जो स्पष्ट रूप से निर्धारित होती है और जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त होती है- 'बाउंड्री' की परिभाषा उतनी स्पष्ट नहीं होती।"
'जिन इलाकों में सीमा को लेकर असहमति, वहां झड़पें जारी रहेंगी'
उन्होंने कहा कि जिन इलाकों में सीमा को लेकर असहमति है, वहां झड़पें जारी रहेंगी। उन्होंने गलवान की झड़प को ऐसी ही एक घटना का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा, "जहां भी असहमति वाले ऐसे इलाके हैं, वहां हमारी झड़पें होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। पूर्व आर्मी चीफ ने आगे कहा, "गलवान की झड़प इस तरह की घटनाओं का एक और उदाहरण थी। हालांकि, अहम बात यह है कि गलवान के बाद की घटनाओं ने साफ कर दिया है कि चीन के मामले में, सीमा विवाद का सैन्य समाधान अब कोई विकल्प नहीं है।"
नरवणे ने यह भी कहा कि सीमाओं को बदलने के लिए एकतरफा तरीके से बल प्रयोग करने के मुद्दे पर भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा, "हमने साफ कर दिया है कि सीमाओं को बदलने के लिए एकतरफा बल प्रयोग करना स्वीकार्य नहीं है।" नरवणे के अनुसार, इस रुख से एक बदलाव आया है और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की कोशिशों को नई गति मिली है। उन्होंने कहा, "इससे एक बदलाव आया है और बातचीत के जरिए इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिशों को नई गति मिली है।"
'गलवान झड़प के बाद भारत ने अपनी साख को और मजबूत किया'
उन्होंने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की व्यवस्था के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, "यही वजह है कि दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।" नरवणे ने आगे कहा कि गलवान झड़प के बाद हुई घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति को और मजबूत किया है। उन्होंने कहा, "गलवान से जो सबसे बड़ा सबक मिला है, वह यह है कि भारत ने विश्व मंच पर अपनी साख को काफी मजबूत किया है- चाहे वह सैन्य, राजनयिक या राजनीतिक स्तर पर हो।"
गलवान के बाद भारत-चीन के संबंध कैसे हैं?
जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प भारत-चीन संबंधों में एक बड़ा मोड़ साबित हुई। इस टकराव में दोनों पक्षों को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा। इस घटना के कारण पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक सैन्य गतिरोध बना रहा, जिसमें दोनों देशों ने LAC के पास अपने सैनिक और सैन्य उपकरण तैनात कर दिए। इसके बाद, भारत और चीन ने सीमा पर गतिरोध को सुलझाने और टकराव वाले बिंदुओं से सैनिकों को पीछे हटाने के लिए कई दौर की सैन्य और राजनयिक बातचीत की।
अक्टूबर 2024 में, दोनों देश पूर्वी लद्दाख के डेपसांग और डेमचोक इलाकों में गश्त की व्यवस्था पर एक समझौते पर पहुंचे। इससे 2020 के गतिरोध से जुड़े बाकी टकराव वाले बिंदुओं से भी सैनिकों को पीछे हटाने में मदद मिली। यह समझौता तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, हालांकि इससे सीमा से जुड़ा बड़ा विवाद हल नहीं हुआ। तब से दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिशें जारी हैं। अगस्त 2025 में, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक द्विपक्षीय बैठक हुई। इस दौरान दोनों पक्षों ने अपने मतभेदों को संभालते हुए संबंधों को सुधारने का प्रयास किया।
दोनों देशों ने 'विशेष प्रतिनिधि तंत्र' (Special Representatives mechanism) के जरिए भी बातचीत जारी रखी है। इस तंत्र को सीमा विवाद को सुलझाने के लिए एक रूपरेखा तैयार करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
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