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महाराष्ट्र के मंत्री छगन भुजबल 11 साल पुराने भ्रष्टाचार के मामले में बरी, कलिना लाइब्रेरी केस में मिली बड़ी राहत

महाराष्ट्र के मंत्री और NCP नेता छगन भुजबल को एक स्पेशल कोर्ट ने उस मामले से बरी कर दिया है जो एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने मुंबई यूनिवर्सिटी में स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी के कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में कथित गड़बड़ियों को लेकर दर्ज किया था।

महाराष्ट्र के मंत्री और NCP नेता छगन भुजबल- India TV Hindi
Image Source : PTI/FILE महाराष्ट्र के मंत्री और NCP नेता छगन भुजबल

महाराष्ट्र के मंत्री और NCP नेता छगन भुजबल को कलिना लाइब्रेरी मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। मुंबई की विशेष सांसद-विधायक अदालत ने गुरुवार को मुंबई विश्वविद्यालय के कलिना कैंपस में सेंट्रल लाइब्रेरी के निर्माण से जुड़े एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) मामले में भुजबल और अन्य आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया। यह मामला 2015 में एंटी-करप्शन ब्यूरो द्वारा दर्ज किया गया था। उस समय भुजबल महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग (PWD) मंत्री थे।

 भुजबल पर लगे थे रिश्वत लेने के आरोप

एंटी-करप्शन ब्यूरो का आरोप था कि मुंबई विश्वविद्यालय की करीब चार एकड़ जमीन का इस्तेमाल सेंट्रल लाइब्रेरी के निर्माण के लिए किया जाना था। 2009 में जमीन के एक हिस्से पर लाइब्रेरी निर्माण के लिए टेंडर जारी किए गए, जबकि बाकी जमीन एक निजी डेवलपर को 99 साल के लिए महज 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से लीज पर दिए जाने का आरोप था। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया था कि इस पूरी प्रक्रिया से राज्य सरकार को भारी आर्थिक नुकसान हुआ और भुजबल समेत आरोपियों को कथित तौर पर आर्थिक लाभ या रिश्वत मिली।

 भुजबल के खिलाफ नहीं मिले सबूत

हालांकि, विशेष अदालत ने भुजबल और अन्य आरोपियों को मामले से आरोपमुक्त कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक अदालत को भुजबल के खिलाफ अपराध से प्राप्त धन या किसी 'quid pro quo' यानी लेन-देन के बदले व्यक्तिगत लाभ का पर्याप्त आधार नहीं मिला। अदालत का विस्तृत आदेश अभी उपलब्ध नहीं हुआ है। कलिना लाइब्रेरी मामला भुजबल के खिलाफ PWD मंत्री रहते दर्ज किए गए ACB के भ्रष्टाचार मामलों में अंतिम लंबित मामला था। इस आदेश के साथ उन लंबित ACB मामलों में भी उनकी कानूनी कार्यवाही समाप्त हो गई है।

बता दें कि भुजबल ने अपने ऊपर लगे आरोपों को कोर्ट में चुनौती दी और मामले की कार्यवाही से बरी करने की मांग की। वकील सुदर्शन खवासे ने उनका पक्ष रखा। कार्यवाही के दौरान बचाव पक्ष ने उन आरोपों का खंडन किया जिनमें भुजबल को इस लेन-देन से हुए किसी भी गैर-कानूनी वित्तीय लाभ से जोड़ा गया था। बरी करने की अर्जी को मंज़ूरी देते हुए, विशेष अदालत ने पाया कि ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था जिससे अपराध से हुई कमाई या भुजबल और अन्य आरोपियों के बीच किसी तरह के 'क्विड प्रो क्वो' (लेन-देन के बदले कुछ पाने) का पता चले। 

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