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कोर्ट के फैसले के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ को लेकर फिर दी धमकी, बोले- बहुत ज्यादा टैरिफ चुकाना पड़ेगा

अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने पिछले हफ्ते शुक्रवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कई देशों के खिलाफ लगाए गए व्यापक शुल्क वृद्धि के आदेशों को रद्द कर दिया था।

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Image Source : AP उच्चतम न्यायालय ने पिछले हफ्ते ट्रंप के आदेशों को कर दिया था रद्द

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को एक बार फिर दुनिया भर के देशों को धमकी दी। राष्ट्रपति ने कहा कि वे सभी देश, उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद उन सभी टैरिफ समझौतों का पालन करें, जिन पर वे सहमत हुए थे। ट्रंप ने ये भी कहा कि वे ग्लोबल टैरिफ को 15 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहते हैं, जो कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद घोषित किए गए 10 प्रतिशत से ज्यादा है। ट्रंप ने सोमवार को ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया, ''कोई भी देश जो उच्चतम न्यायालय के हास्यास्पद फैसले की आड़ में बचना चाहता है, खासकर वे देश जिन्होंने सालों बल्कि दशकों से अमेरिका को 'लूटा' है, उन्हें हाल में सहमत हुए टैरिफ से कहीं ज्यादा टैरिफ का सामना करना पड़ेगा।''

उच्चतम न्यायालय ने पिछले हफ्ते ट्रंप के आदेशों को कर दिया था रद्द

बताते चलें कि अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने पिछले हफ्ते शुक्रवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कई देशों के खिलाफ लगाए गए व्यापक शुल्क वृद्धि के आदेशों को रद्द कर दिया था। न्यायालय द्वारा 6-3 के बहुमत से सुनाए गए इस फैसले का केंद्र बिंदु आपातकालीन शक्तियों के कानून के तहत लगाए गए शुल्क हैं, जिनमें लगभग हर दूसरे देश पर लगाए गए व्यापक ''पारस्परिक'' शुल्क भी शामिल हैं। ये ट्रंप के व्यापक एजेंडे का पहला महत्वपूर्ण हिस्सा है जो सीधे देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष आया है। 

कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा था

न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान ''बहुत स्पष्ट रूप से'' कांग्रेस को टैक्स लगाने की शक्ति देता है, जिसमें शुल्क भी शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने फैसले में लिखा, ''संविधान निर्माताओं ने कराधान की शक्ति का कोई भी हिस्सा कार्यपालिका शाखा को नहीं सौंपा।'' न्यायमूर्ति सैमुअल एलिटो, न्यायमूर्ति क्लेरेंस थॉमस और न्यायमूर्ति ब्रेट कावानॉ ने असहमति व्यक्त की। न्यायमूर्ति कावानॉ ने लिखा, ''यहां जिन शुल्कों पर चर्चा हो रही है, वे नीति के लिहाज से उचित हो सकते हैं या नहीं हो सकते हैं। लेकिन लिखित प्रमाण, इतिहास और पूर्व उदाहरणों के आधार पर, ये स्पष्ट रूप से वैध हैं।'' 

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