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ईरान युद्ध के बीच भारत फिर बेस्ट फ्रेंड रूस की तरफ बढ़ाएगा कदम, 40% तक पहुंच सकता है तेल आयात

भारत ने पहले रूस से सस्ता कच्चा तेल बड़ी मात्रा में खरीदा था। इससे रूस की अर्थव्यवस्था को भी काफी मदद मिली थी। चर्चा है कि भारत और रूस के बीच LNG की सीधी आपूर्ति पर सहमति बन रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन। (फाइल फोटो)- India TV Hindi
Image Source : PTI प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन। (फाइल फोटो)

जनवरी में जब भारत अमेरिका के साथ निर्यात पर लगाए गए दंडात्मक टैरिफ में राहत पाने के लिए बातचीत कर रहा था, तब नई दिल्ली ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में कटौती की थी। इस कदम को डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में उठाया गया एक “कठिन समझौता” माना गया। लेकिन महज दो महीने बाद हालात पूरी तरह बदल गए हैं। अब भारत और रूस एक बार फिर अपने ऊर्जा संबंधों को मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

LNG और तेल पर नई पहल

Jerusalem Post के हवाले से खबर में कहा गया है कि भारत और रूस के बीच लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी LNG की सीधी आपूर्ति दोबारा शुरू करने पर सहमति बन रही है। यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार ऐसा होगा जब रूस सीधे भारत को LNG बेचेगा। यह “मौखिक सहमति” 19 मार्च को दिल्ली में रूसी उप ऊर्जा मंत्री पावेल सोरोकिन और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के बीच हुई बैठक में बनी। इसके साथ ही रूस से कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। अनुमान है कि रूस से तेल आयात करीब एक महीने में दोगुना होकर 40% तक पहुंच सकता है।

पश्चिम एशिया संकट का असर

ईरान पर अमेरिका-इज़राइल हमले और इसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव के कारण भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा, क्योंकि देश का लगभग आधा तेल और LNG इसी रास्ते से आता है। इसका असर देश में भी दिखा- जिसमें पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें, कुकिंग गैस सप्लाई की किल्लत, ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आदि देखा गया।

पहले क्यों घटाई थी खरीद?

भारत ने पहले रूस से सस्ता कच्चा तेल बड़ी मात्रा में खरीदा था, जिससे मॉस्को की अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिला। लेकिन बाद में अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत ने रूसी तेल खरीद में कटौती कर दी थी। हालांकि, अब हालात बदलने के बाद भारत फिर से अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस की ओर झुकता दिख रहा है।

आर्थिक चुनौतियों की आशंका

सरकारी आकलन के अनुसार, अगर मध्य-पूर्व से तेल आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो महंगाई बढ़ सकती है, रुपया कमजोर हो सकता है, विदेशी कर्ज बढ़ सकता है और निर्यात में 2% से 4% तक गिरावट आ सकती है। पूर्व राजनयिक अजय मल्होत्रा कहते हैं कि भारत ने वही रास्ता चुना है जो उसके हित में है और जो रूस के साथ लंबे समय से चले आ रहे भरोसेमंद संबंधों पर आधारित है।

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