हेल्थ इंश्योरेंस (स्वास्थ्य बीमा) को आम लोगों के लिए सुलभ और बीमा उद्योग को टिकाऊ बनाए रखने की कोशिश में भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) अब स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम में सालाना बढ़ोतरी पर नियंत्रण लगाने की तैयारी में है। आईआरडीएआई एक ऐसी नीति लाने पर विचार कर रहा है जिसमें बीमा कंपनियों को स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम में हर साल मेडिकल महंगाई के मुताबिक ही सीमित बढ़ोतरी की अनुमति दी जाएगी। यह सीमा व्यक्तिगत बीमा उत्पादों के साथ-साथ कंपनी के पूरे पोर्टफोलियो स्तर पर भी लागू हो सकती है।
इस फैसले की जरूरत क्यों पड़ी?
खबर के मुताबिक, अभी कई बीमा कंपनियां शुरुआत में कम प्रीमियम वाली पॉलिसियां देती हैं, लेकिन कुछ सालों बाद अचानक दरें बढ़ा देती हैं। इससे ग्राहकों पर वित्तीय बोझ बढ़ता है और उनके पास विकल्प सीमित हो जाते हैं। फिलहाल केवल वरिष्ठ नागरिकों के प्रीमियम में सालाना 10% से अधिक की वृद्धि पर रोक है। अन्य ग्राहकों के लिए कोई स्पष्ट सीमा नहीं है।
वित्त वर्ष 2025 में हेल्थ इंश्योरेंस का योगदान सामान्य बीमा प्रीमियम में 40% तक पहुंचने का अनुमान है। कोविड-19 महामारी के बाद स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत ने बीमा प्रीमियम में भी इजाफा किया है, जिससे आईआरडीएआई की निगरानी और हस्तक्षेप की भूमिका और अधिक अहम हो गई है।
कंपनियों का स्वास्थ्य बीमा पर निर्भरता
New India Assurance: कुल प्रीमियम का लगभग 50% स्वास्थ्य बीमा से
ICICI Lombard: लगभग 30%
Go Digit General Insurance: केवल 14%
यह आंकड़े दर्शाते हैं कि स्वास्थ्य बीमा अब कंपनियों के राजस्व का अहम स्रोत बन चुका है।
सीनियर सिटिजन्स के लिए पहले ही लागू है कैप
इस साल की शुरुआत में आईआरडीएआई ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए सालाना प्रीमियम वृद्धि को 10% तक सीमित कर दिया था। हालांकि, इसके बाद आशंका जताई गई कि बीमा कंपनियां बाकी वर्गों के ग्राहकों पर यह बोझ डाल सकती हैं।
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