1. Hindi News
  2. धर्म
  3. त्योहार
  4. नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है? जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व

नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है? जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व

नाग पंचमी के दिन नाग देव की पूजा करने से सर्प भय समाप्त होता है और कुंडली का कालसर्प दोष दूर होता है। तो आइए जानते हैं कि नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है यहां पढ़िए पौराणिक कथा।

नाग पंचमी की पौराणिक कथा- India TV Hindi
Image Source : FILE IMAGE नाग पंचमी की पौराणिक कथा

हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता को दूध, लावा और फल-फूल चढ़ाया जाता है। नाग पंचमी की पूजा करने से कालसर्प जैसे दोष से शीघ्र छुटकारा मिल जाता है। इस साल नाग पंचमी पर सावन सोमवार का भी शुभ संयोग बन रहा है। ज्योतिषों की दृष्टि से यह योग अत्यंत ही दुर्लभ और फलदायी माना होता है। तो नाग पंचमी के दिन नाग देव और महादेव की पूजा-अर्चना करें। घर में सुख-समृद्धि और तरक्की की प्राप्ति होगी। तो आइए अब जानते हैं कि नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है और इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है।

नाग पंचमी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, कुरुवंश के राजा परीक्षित (अभिमन्यु के पुत्र) को शमीक ऋषि के श्राप के कारण तक्षक नाग ने डस लिया था, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। अपने पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर उनके पुत्र राजा जनमेजय अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने संसार से समस्त सर्पों का विनाश करने के लिए एक विशाल 'सर्प सत्र महायज्ञ' का आयोजन किया। राजा जनमेजय के सर्प सत्र यज्ञ में ऋषियों द्वारा उच्चारित शक्तिशाली मंत्रों के प्रभाव से दुनिया भर के सर्प खुद-ब-खुद खिंचकर यज्ञ कुंड की अग्नि में गिरकर भस्म होने लगे। प्राण बचाने के लिए तक्षक नाग देवराज इंद्र की शरण में पहुंचे और उनके सिंहासन से लिपट गए। जब ऋषियों ने इंद्र सहित तक्षक को यज्ञ कुंड में खींचने के लिए मंत्र पढ़ने शुरू किए तो देवलोक में हाहाकार मच गया।

तब देवताओं की प्रार्थना पर माता मनसा देवी के पुत्र युवा विद्वान आस्तीक मुनि राजा जनमेजय के यज्ञ स्थल पर पहुंचे। उन्होंने अपने ज्ञान और वचनों से राजा जनमेजय को अत्यंत प्रसन्न किया।  यज्ञ की समाप्ति और नाग वंश की रक्षाराजा जनमेजय ने आस्तीक मुनि को मनचाहा वरदान मांगने को कहा। तब आस्तीक मुनि ने वरदान में इस सर्प सत्र यज्ञ को तुरंत रोकने और नागों को अभयदान देने की मांग की। आस्तीक मुनि के आग्रह पर राजा जनमेजय ने यज्ञ समाप्त कर दिया जिससे तक्षक नाग और बाकी नागों के प्राण बच गए।  

जिस दिन आस्तीक मुनि ने यज्ञ रुकवाकर नागों के प्राणों की रक्षा की थी और उन पर कच्चा दूध व जल छिड़क कर उनकी तपन शांत की थी, उस दिन सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। तब नागों ने आशीर्वाद दिया कि इस तिथि को जो मेरी पूजा करेगा, उसे सर्प भय नहीं होगा। तभी से यह पर्व नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

ये भी पढ़ें: 

पंचांग: सावन सोमवार व्रत और नाग पंचमी का पर्व 17 अगस्त को, जानें शुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय