Ekadashi Vishnu Chalisa Niyam: अधिक मास की एकादशी के दिन विष्णु चालीसा का पाठ करते समय न करें ये गलतियां, वरना नारायण की कृपा से रह जाएंगे वंचित
Vishnu Chalisa Niyam Rules: अधिक मास की एकादशी के दिन व्रत रखकर पूजा करने से कई गुना अधिक फलों की प्राप्ति होती है। इस पवित्र दिन पर विष्णु चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। आइए जानते हैं कि विष्णु चालीसा का पाठ करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

Vishnu Chalisa Lyrics In Hindi: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी भक्त सच्चे मन से नारायण की उपासना करता है उसके सभी दुख-परेशानी दूर हो जाता है। आपको बता दें कि अधिक मास का महीना भी विष्णु जी का प्रिय माह माना जाता है। ऐसे में अधिक मास में आने वाली एकादशी का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। 11 जून को अधिक मास की परम एकादशी का व्रत रखा जाएगा। यह एकादशी 3 साल में एक बार अधिक माह में ही आती है। ऐसे में इस शुभ और पावन दिन भगवान विष्णु जी की पूजा के साथ ही चालीसा का पाठ भी अवश्य करें। लेकिन ध्यान रहे हैं कि विष्णु चालीसा का पाठ करते समय ये गलतियां भूलकर भी न हो वरना आपको पूजा का फल प्राप्त नहीं होगा। तो आइए जानते हैं विष्णु चालीसा पाठ के सही नियमों के बारे में।
विष्णु चालीसा पाठ करते समय इन बातों का रखें ध्यान
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शुद्धता: एकादशी के दिन सुबह के समय ही स्नान आदि कर लें। इसके बाद साफ-सुथरे कपड़े पहनें। इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना गया है। तो विष्णु चालीसा का पाठ सदैव साफ और शुद्ध कपड़े पहन कर ही करें।
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दिशा का ध्यान रखें: हिंदू धर्म में पूजा पाठ करते समय दिशा का खास ध्यान रखा जाता है। तो विष्णु चालीसा का पाठ करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें। तभी चालीसा का सकारात्मक परिणाम देखने को मिलता है।
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आसन पर बैठें: पूजा पाठ या चालीसा का पाठ कभी भी खाली जमीन पर बैठकर न करें। विष्णु चालीसा का पाठ आसन पर बैठकर ही करें।
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चालीसा पाठ करते समय बीच में बातें न करें: पाठ के दौरान किसी से बात करना, मोबाइल देखना या बार-बार उठना नहीं चाहिए। पूरे ध्यान और एकाग्रता के साथ ही विष्णु चालीसा का पाठ करें। शांत और एकाग्र मन से विष्णु चालीसा का पाठ करें।
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बिना दीपक जलाएं न करें पाठ: विष्णु चालीसा का पाठ शुरू करने से पहले भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाएं। दीपक जलाने के बाद चालीसा का पाठ शुरू करना चाहिए।
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भोग लगाएं: एकादशी के दिन विष्णु चालीसा का पाठ पूरा होने के बाद नारायण को तुलसी डालकर पीले फल या मिठाई का भोग लगाएं। ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी में स्पर्श न करें और पत्ते तोड़ें। पूजा के लिए एक दिन पहले तुलसी तोड़कर रख लें।
श्री विष्णु चालीसा
॥ दोहा ॥
विष्णु सुनिए विनय,सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूँ,दीजै ज्ञान बताय॥
॥ चौपाई ॥
नमो विष्णु भगवान खरारी।कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी।त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत।सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
तन पर पीताम्बर अति सोहत।बैजन्ती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा बिराजे।देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन।दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन।दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण।कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
करत अनेक रूप प्रभु धारण।केवल आप भक्ति के कारण॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा।तब तुम रूप राम का धारा॥
भार उतार असुर दल मारा।रावण आदिक को संहारा॥
आप वाराह रूप बनाया।हिरण्याक्ष को मार गिराया॥
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया।चौदह रतनन को निकलाया॥
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया।रूप मोहनी आप दिखाया॥
देवन को अमृत पान कराया।असुरन को छबि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया।मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया।भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदन को जब असुर डुबाया।कर प्रबन्ध उन्हें ढुँढवाया॥
मोहित बनकर खलहि नचाया।उसही कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई।शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥
हार पार शिव सकल बनाई।कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी।बतलाई सब विपत कहानी॥
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी।वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी।हना असुर उर शिव शैतानी॥
तुमने धुरू प्रहलाद उबारे।हिरणाकुश आदिक खल मारे॥
गणिका और अजामिल तारे।बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
हरहु सकल संताप हमारे।कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
देखहुँ मैं निज दरश तुम्हारे।दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
चहत आपका सेवक दर्शन।करहु दया अपनी मधुसूदन॥
जानूं नहीं योग्य जप पूजन।होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
शीलदया सन्तोष सुलक्षण।विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
करहुँ आपका किस विधि पूजन।कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
करहुँ प्रणाम कौन विधिसुमिरण।कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण॥
सुर मुनि करत सदा सिवकाई।हर्षित रहत परम गति पाई॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई।निज जन जान लेव अपनाई॥
पाप दोष संताप नशाओ।भव बन्धन से मुक्त कराओ॥
सुत सम्पति दे सुख उपजाओ।निज चरनन का दास बनाओ॥
निगम सदा ये विनय सुनावै।पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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