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Parama Ekadashi Vrat Katha: 3 साल में एक बार आती है परम एकादशी, इस दिन जरूर पढ़ें कंगाली और दरिद्रता दूर करने वाली ये पावन कथा

 Written By: Laveena Sharma @laveena1693
 Published : Jun 10, 2026 07:06 pm IST,  Updated : Jun 11, 2026 06:30 am IST

Parama Ekadashi 2026 Vrat Katha: कथा अनुसार परम एकादशी व्रत को करने से ही धन के देवता कुबेर को धनाध्यक्ष का पद प्राप्त हुआ था। वहीं इस व्रत ने ही राजा हरिश्चन्द्र को पुत्र, स्त्री और राज्य का सुख दिलाया था। चलिए जानते हैं परम एकादशी की पावन कथा के बारे में यहां।

parama ekadashi vrat katha- India TV Hindi
परम एकादशी व्रत कथा Image Source : INDIA TV

Parama Ekadashi 2026 Vrat Katha (परम एकादशी व्रत कथा): परम एकादशी व्रत 11 जून 2026 को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं अनुसार इस व्रत को रखने से धन-वैभव की प्राप्ति होती है और दरिद्रता का नाश हो जाता है। ये व्रत अधिक मास के कृष्ण पक्ष में रखा जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। बता दें ये एकादशी व्रत उसी वर्ष आता है जिस वर्ष में अधिक मास लगता है। इस साल अधिक मास ज्येष्ठ महीने में लगा है जिसकी समाप्ति 15 जून को हो रही है। बता दें परम एकादशी को कमला एकादशी और अधिक मास की एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। चलिए अब जानते हैं परम एकादशी के दिन कौन सी कथा का पाठ किया जाता है।

परमा एकादशी व्रत कथा (Parama Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

काम्पिल्य नाम की नगरी में सुमेधा नाम का एक धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था। पूर्व जन्म के पाप के कारण वह और उसकी पत्नी गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे थे। भिक्षा मांगने पर भी उन्हें कोई भिक्षा नहीं देता था।  हर चीज का अभाव होने के बाद भी उस ब्राह्मण की पत्नी अपने पति की सच्चे मन से सेवा किया करती थी और घर आए अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी। एक दिन ब्राह्मण अपनी स्त्री से बोला कि प्रिय! जब मैं अमीरों धन की याचना करता हूं तो वह मेरी सहायता करने से साफ-साफ मना कर देते हैं। लेकिन गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती, इसलिए यदि तुम सहमति हो तो मैं परदेस जाकर कुछ पैसा कमाकर ले आऊं।

ब्राह्मण की पत्नी ने कहा हे स्वामी! मैं आपकी दासी हूं। पति अच्छा या बुरा जो कुछ भी कहे पत्नी को वही करना चाहिए। स्वामी मनुष्य को पूर्व जन्म के कर्मों का फल मिलता है। पूर्व जन्म में जो मनुष्य विद्या और भूमि का दान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में ये दोनों चीजें जरूर प्राप्त होती हैं। ईश्वर ने जिसके भाग्य में जो लिख दिया है उसे कोई टाल नहीं सकता। यदि कोई मनुष्य दान नहीं करता तो प्रभु उसे केवल अन्न ही देते हैं। अत: आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि मैं आपसे अलग नहीं रह सकती। पति के बिना रह रही स्त्री की सभी निंदा करते हैं। हे स्वामी! मेरी आपसे यही विनती है कि कृपा कर आप कहीं न जाएं, जो भाग्य में होगा वहीं हमें मिलेगा। 

अपनी स्त्री की सलाह मानकर ब्राह्मण कहीं नहीं गया और वो दोनों इसी प्रकार दुख और गरीबी में समय व्यतीत करते रहे। एक बार उनके घर पर कौण्डिन्य ऋषि आए। ब्राह्मण सुमेधा और उनकी स्त्री ने उन्हें प्रणाम किया और बोले कि आज हमारा जीवन धन्य हो गया है। आपके दर्शन पाकर हम बेहद सुख का अनुभव कर रहे हैं। ऋषि को उन्होंने पवित्र मन से भोजन कराया। भोजन के बाद ब्राह्मणी ने कहा हे ऋषिवर, कृपा कर आप मुझे गरीबी दूर करने का उपाय बताएं। मैंने अपने पति को परदेश जाकर धन कमाने से रोका है और भाग्य से आपके दर्शन हमें प्राप्त हुए हैं। अत: मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब हमारी दरिद्रता जल्दी ही दूर हो जाएगी। 

कौण्डिन्य ऋषि बोले हे ब्राह्मणी, अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली परमा एकादशी का व्रत रखों। इस व्रत को करने से सभी पापों, दुःखों और दरिद्रता का नाश हो जाता है। इस व्रत में अन्न का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए और रात्रि जागरण करना चाहिए। यह एकादशी व्रत धन-वैभव प्रदान करता है। धनाधिपति कुबेर ने भी इस व्रत का पालन करके ही भगवान भोलेनाथ से धनाध्यक्ष का पद प्राप्त किया था। इसी व्रत को करने से सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र को उनका राज्य और वैभव वापस प्राप्त हुआ था। 

आगे ऋषि ने कहा: हे ब्राह्मणी! पंचरात्रि व्रत तो इससे भी ज्यादा उत्तम है। अगर परमा एकादशी के दिन से शुरू करके अमावस्या तक व्रत रखा जाए तो स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती। जो मनुष्य इन पांच दिन व्रत रहकर ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वे समस्त संसार को भोजन कराने का फल प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य इस व्रत में ब्राह्मण को तिल दान करते हैं, वे तिल की संख्या के बराबर वर्षो तक भगवान विष्णु के लोक में वास करते हैं। हे ब्राह्मणी! यदि तुम अपने पति के साथ इस व्रत को रखती हो तो तुम्हें अवश्य ही स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

ऋषि के कहे अनुसार ब्राह्मण और उसकी स्त्री ने परमा एकादशी से लेकर अमावस्या तक यानी 5 दिन का व्रत किया। व्रत के समाप्त होते ही ब्राह्मण की स्त्री ने एक राजकुमार को अपने यहां आते देखा। राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से ब्राह्मण को एक भव्य घर रहने के लिए दिया। साथ ही राजकुमार ने आजीविका के लिए उन्हें एक गांव भी दिया जिससे उनकी गरीबी दूर हो गई।

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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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