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जगन्नाथ रथ यात्रा में क्यों जानबूझकर फोड़े जाते हैं प्रसाद के घड़े? इंसान क्यों नहीं खा सकते यह भोग?

ओडिशा के पुरी शहर में निकाली जाने वाली विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 से शुरू हो गई है। क्या आप जानते हैं कि इस यात्रा से जुड़े कई ऐसे चमत्कार, रहस्य और परंपराएं हैं जो इसकी दिव्यता को ओर भी ज्यादा बढ़ा देते हैं। इन्हीं में से एक है 'अधर पना' की परंपरा।

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Image Source : INDIA TV जगन्नाथ रथ का दिव्य प्रसाद, जिसे इंसान नहीं खा सकते

ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान मटके तोड़कर प्रसाद गिराने वाली एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। लेकिन ये प्रसाद रथ यात्रा में शामिल हुए श्रद्धालुओं के लिए नहीं होता। इसी कारण से न तो कोई पुजारी और न ही यात्रा में शामिल हुए लोग यानी कोई भी व्यक्ति इस प्रसाद को नहीं खाता। लेकिन ऐसा क्यों किया जाता है? क्या है इस परंपरा के पीछे का रहस्य? यहां हम इसी बारे में आपको बताएंगे।

अधर पना प्रसाद का रहस्य

यात्रा के दौरान प्रसाद गिराने वाली परंपरा को अधर पना कहा जाता है। ये इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान होता है। हर साल आषाढ़ महीने की त्रयोदशी तिथि को ये विशेष रस्म निभाई जाती है। इस रस्म के तहत मिट्टी से बनाए गए बर्तनों में एक खास पेय पदार्थ भरा जाता है, जिसका रंग सफेद होता है। यह विशेष पेय दुध, पनीर, चीनी, केला, तुलसी, दालचीनी, जायफल समेत कई सुगंधित चीजों से तैयार किया जाता है। इसे मिट्टी के बड़े बर्तनों में भरकर अदृश्य शक्तियों को अर्पित किया जाता है। कहते हैं इस यात्रा में इंसान ही नहीं बल्कि अदृश्य और पवित्र शक्तियां भी शामिल होती हैं, जिन्हें तृप्त करने के लिए रथों पर रखे गए इस विशेष प्रसाद के मटकों को फोड़ा जाता है।  

ऐसे निभाई जाती है ये खास परंपरा

रथ यात्रा के दौरान निभाई जाने वाली इस परंपरा के तहत मिट्टी के तीन बड़े-बड़े बर्तनों में इस खास शरबत को भरा जाता है। फिर ये तीनों बर्तन तीनों रथों पर इस तरह से रखे जाते हैं कि इनकी ऊंचाई भगवान के होंठों के पास हो। इसके बाद पूजा-अर्चना कर इन घड़ों को तोड़ दिया जाता है, जिससे सारा प्रसाद बहकर रथ के चारों ओर फैल जाता है। यह जगन्नाथ धाम का एक ऐसा महाप्रसाद है जिसे कोई भक्त ग्रहण नहीं कर सकता और न ही मंदिर के पुजारी।

इंसान क्यों नहीं कर सकते इस प्रसाद का सेवन?

शास्त्रों और मान्यताओं अनुसार, यह भोग उन सूक्ष्म जीवों, आत्माओं और पारलौकिक शक्तियों के लिए होता है जो भगवान के दर्शन करने के लिए यात्रा में शामिल होती हैं। लेकिन यह प्रसाद इंसानों को छूने की मनाही है। कहते हैं यदि कोई मनुष्य इस प्रसाद को ग्रहण करने का प्रयास करता है, तो इसे अदृश्य शक्तियों के अधिकार में हस्तक्षेप करना माना जाता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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