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क्यों अधूरी मूर्तियों के साथ ही नगर भ्रमण पर निकलते हैं भगवान जगन्नाथ

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Jul 15, 2026 07:47 am IST,  Updated : Jul 17, 2026 07:22 am IST

क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति इतनी अलग क्यों है। न पूरे हाथ बने हैं और न ही पैर। आंखे भी इतनी बड़ी हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ये मूर्ति अधूरी रह गई थी। तो आपको बता दें कि ये कोई सामान्य मूर्ति नहीं है बल्कि भगवान कृष्ण की दिव्यता का सबसे रहस्यमयी स्वरूप है।

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क्या है जगन्नाथ मंदिर की अधूरी मूर्तियों का रहस्य? Image Source : PTI/CANVA

हर साल आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर से भव्य रथयात्रा की शुरुआत होती है। इस साल ये यात्रा 16 जुलाई 2026, गुरुवार से शुरू हो रही है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि देश के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में शामिल जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी क्यों हैं? आखिर इन मूर्तियों में हाथ-पैर पूरे क्यों नहीं बने हैं? चलिए आपको बताते हैं इसका रहस्य।

जगन्नाथ मंदिर में क्यों अधूरी मूर्तियों की होती है पूजा

पौराणिक कथाओं अनुसार इस परंपरा की शुरुआत मालवा के राजा इंद्रद्युम के समय हुई थी, जो भगवान विष्णु के परम भक्त थे। कहते हैं एक दिन भगवान ने राजा को सपने में दर्शन देकर उनका एक भव्य मंदिर बनवाने का आदेश दिया और कहा कि वे एक विशेष स्वरूप में प्रकट होना चाहता हैं। राजा ने मूर्ति बनवाने के लिए लकड़ियों की खोज शुरू कर दी। राजा को समुद्र में एक ऐसी दिव्य लकड़ी का टुकड़ा मिला, जो न तो डूबता था, न ही जलता था और छूते ही ह्रदय को शांति देता था। मूर्ति के लिए लकड़ी तो मिल गई थी, लेकिन अभी कोई कुशल कारीगर नहीं मिला था। तभी मूर्ति बनाने के लिए एक रहस्यमयी वृद्ध व्यक्ति राजा के पास आया। कहते हैं ये बूढ़ा व्यक्ति भगवान विश्वकर्मा थे।

वृद्ध व्यक्ति ने बोला मैं भगवान की मूर्तियां बनाऊंगा। लेकिन मेरी एक शर्त है कि 21 दिनों तक कोई भी व्यक्ति मेरे कक्ष का दरवाजा नहीं खोलेगा। अगर ऐसा हुआ तो मैं मूर्तियां बनाने का काम बीच में ही छोड़ दूंगा। राजा ने शर्त स्वीकार कर ली। कुछ दिनों तक तो कक्ष से आरी और हथौड़े की आवाज आती रही, लेकिन एक दिन अचानक से आवाज आना बंद हो गया। जिससे राजा परेशान हो गए और सोचने लगे कि कहीं वृद्ध व्यक्ति के साथ कुछ गलत तो नहीं हो गया। ये सोचकर राजा ने 15वें दिन कक्ष का द्वार खोल दिया।

राजा ने देखा कि अंदर मूर्तिकार नहीं था, लेकिन वहां तीन मूर्तियां थीं जो अधूरी रह गई थीं। राजा को बहुत दुख हुआ कि उनके कारण भगवान की मूर्तियां अधूरी रह गईं। तभी आकाशवाणी हुई कि राजन आपने समय से पहला द्वार खोल दिया, जिससे मेरा यह स्वरूप अधूरा रह गया। लेकिन ये मेरा सबसे प्रिय स्वरूप है और इसी रूप में मैं इस युग में पूजा जाऊंगा। कहते हैं इसी कारण से भगवान जगन्नाथ की अधूरी मूर्तियों की पूजा होती है और साल में एक बार भगवान नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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