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जब AC नहीं थे तो अंग्रेजों ने कैसे बनाए ट्रेनों के AC कोच, बेहद अनोखी थी टेक्निक; यकीन नहीं होगा

Interesting Facts : सोशल मीडिया पर आपने अंग्रेजों के दौर से जुड़ी कई रहस्यमयी चीजों के बारे में पढ़ा होगा। मगर, क्या कभी सोचा है कि जब AC नहीं थे तो अंग्रेजों के लिए ट्रेनों के कोच कैसे बनाए जाते थे ?

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Image Source : INDIAN RAIL INFO ट्रेनों के AC कोच।

Interesting Facts : भारत ने एक लंबे समय तक अंग्रेजों की गुलामी का दंश झेला। इस दौरान भारत के लोगों को कई तरह के कष्ट झेलने पड़े। हालांकि, उतनी ही तकलीफ अंग्रेजों को भी उठानी पड़ती थी। इसके पीछे वजह कोई शोषण या अत्याचार नहीं बल्कि, भारत की जलवायु और मौसम था। दरअसल, भारत की प्रचंड गर्मी के आगे अंग्रेजों के सारे तरीके नाकाम होते थे। मगर, क्या आपने कभी सोचा है कि जब AC नहीं थे तो अंग्रेजों के लिए ट्रेनों के कोच कैसे बनाए जाते थे ? आज भारतीय रेलवे में एयर कंडीशंड (AC) कोच आम बात है, लेकिन कल्पना कीजिए कि 1930 के दशक में, बिना बिजली के आधुनिक AC के, ब्रिटिश अधिकारी और अमीर यात्री गर्मी से कैसे बचते थे?  

अंग्रेजों ने कैसे किया AC कोच का जुगाड़ 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस दौरान ट्रेन के नीचे विशाल बर्फ के ब्लॉक रखे जाते थे, बैटरी से चलने वाले ब्लोअर या पंखे ठंडी हवा को कोच के अंदर फेंकते थे। यह टेक्निक ब्रिटिश काल में ‘आइस-कूल्ड’ लग्जरी ट्रैवल नाम से प्रचलित हुआ। भारतीय रेलवे में पहली ‘एयर कंडीशंड’ सुविधा 1930 के दशक में शुरू हुई। ट्रेन का नाम था फ्रंटियर मेल (जिसे पहले पंजाब मेल कहा जाता था), जो मुंबई से पेशावर (अब पाकिस्तान) तक जाती थी। आधुनिक रेफ्रिजरेंट गैस या कम्प्रेसर के बजाय इसमें बर्फ का इस्तेमाल होता था। पहले दर्जे के कोच में फ्लोर के नीचे सील्ड रिसेप्टेकल्स (खोखले डिब्बे) बनाए जाते थे। इनमें बड़े-बड़े आयताकार आइस ब्लॉक रखे जाते थे, जो स्टेशनों पर रास्ते में दोबारा भरे जाते थे। बैटरी से चलने वाला ब्लोअर हवा को बर्फ पर से गुजारता, ठंडी हवा वेंट्स के जरिए इंसुलेटेड कोच में फैलती। गर्मी में पिघलती बर्फ को नियमित रूप से बदलना पड़ता था। 

ठंडक बरकरार रखने के लिए थे हैवी इंसुलेटेड कोच 

बता दें कि, बर्फ प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराई जाती। 1942 की एक प्रसिद्ध तस्वीर में बयाना जंक्शन पर फ्रंटियर मेल के पहले दर्जे के कोच में बर्फ लोड करते दिखाई देते हैं। कोच हेवी इंसुलेशन वाले होते, ताकि ठंडक बरकरार रहे। यह सुविधा मुख्य रूप से ब्रिटिश अधिकारियों और यूरोपीय यात्रियों के लिए थी। भारतीयों को ज्यादातर थर्ड या इंटरमीडिएट क्लास में सफर करना पड़ता, जहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। 

क्यों बनाई गई यह टेक्निक 

भारत की प्रचंड गर्मी ब्रिटिशों के लिए चुनौती थी। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के शुरू में रेलवे कंपनियां लग्जरी कोच बना रही थीं। 1930 के दशक तक बिजली आधारित AC महंगा और तकनीकी रूप से जटिल था। फैक्ट्री या प्राकृतिक स्रोतों के कारण बर्फ सस्ता विकल्प था। ट्रेन के 35 स्टॉप्स पर बर्फ रीलोड करना संभव था। पहली पूरी तरह एयर-कंडीशंड ट्रेन आने के बाद भी काफी समय तक ये टेक्निक प्रचलित रही। 

ब्रिटिश काल में कैसे होते थे कोच

जानकार बताते हैं कि, पहले दर्जे के कोच नॉन-कॉरिडोर टाइप के होते। पूरा कोच 6 केबिन में बंटा होता था जिसमें कुछ 2-बर्थ, कुछ 4-बर्थ। हर केबिन में अपना दरवाजा प्लेटफॉर्म की तरफ, वेस्टर्न स्टाइल टॉयलेट, शावर और कभी-कभी नौकरों के लिए अलग छोटा कंपार्टमेंट। अंदर राजसी बेड, कार्पेट, वुड पैनलिंग, इलेक्ट्रिक लाइट्स और सीलिंग फैन। 1952 से पहले निचली क्लास में लाइट या फैन भी नहीं होते थे। बर्फ के अलावा वेंटिलेशन पर भी जोर था। खिड़कियों में विशेष लूवर्स, डबल वॉल इंसुलेशन। हालांकि ट्रेन में मुख्य रूप से बर्फ और बैटरी फैन ही चलन में थे। 
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।

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