ट्रेन से आवागमन करते समय सभी यात्री सीट पर बैठकर आरामदायक सफर करने की इच्छा रखते हैं। इसके लिए लोग टिकट बुक करते समय ही मनपसंद सीट का चयन करते हैं ताकि सफर के दौरान उनके आराम में किसी प्रकार का खलल न पड़े। प्राय: लोगों को उनकी प्राथमिकता के मुताबिक सीट मिल जाती है लेकिन कई बार सीटों की अनुपलब्धता होने के कारण लोगों को खराब सीटों से संतोष करना पड़ता है। ट्रेन की सीटों पर बैठते या लेटते समय कभी आपने सोचा है कि आखिर इन सीटों के अंदर ऐसा कौन सा मैटेरियल होता है जो आराम की अनुभूति कराता है ? ज्यादातर लोगों को लगता है कि इन सीटों के अंदर सफेद रुई या फोम भरा होता है जबकि, ऐसा नहीं है। इनके अलावा भी ट्रेन की सीटों में एक मैटेरियल यूज होता है। हम आपको बताते हैं कि, सीटों में रुई क्यों नहीं भरी होती है और कौन सा मैटेरियल यूज होता है।
ट्रेन की सीटों में क्या भरा होता है
RDSO (Research Designs and Standards Organisation) की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेनों के अंदर बनी सीटों के लिए फ्लेक्सिबल लोड-बेयरिंग पॉलीयुरेथेन फोम या फायर रिटार्डेंट मैटेरियल का ही यूज होता है। आधुनिक कोचों में फोम/पॉलिएस्टर ही प्रमुख है। बता दें कि, सस्ती और मुलायम होने के बावजूद रुई ट्रेन जैसी संवेदनशील और भारी-भरकम जगह के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती है। जबकि फोम और आधुनिक मैटेरियल सुरक्षा, टिकाऊपन और आराम तीनों प्रदान करते हैं। यही वजह है कि, ट्रेन की सीटों में रुई नहीं भरी जाती है।
सीटों में रुई न भरने के प्रमुख कारण
ट्रेनों में रुई न भरे जाने के कई कारण होते हैं। ये कारण शेप मेंटेनेंस, फायर सेफ्टी, हाइजीन और कंफर्ट की दृष्टि से काफी अहम होते हैं। इनको इस प्रकार समझा जा सकता है:
- रुई के मुलायम होने के कारण लगातार प्रेशर पड़ने से कॉटन कंप्रेस हो जाती है और शेप बिगड़ सकता है। जबकि फोम या पॉलिएस्टर लंबे समय तक उसका आकार बनाए रखते हैं।
- फायर सेफ्टी के दृष्टिकोण से देखें तो रुई आसानी से जल सकती है और आग फैलाने का खतरा भी बढ़ाती है।
- रुई की प्रवृति नमी सोखने की होती है जिससे से बैटीरिया और दुर्गंध को जन्म देती है। जबकि फोम साफ होता है और लंबे समय तक इस्तेमाल करने के योग्य होता है।
सीट में क्या-क्या होता है
ट्रेन की सीटों का मजबूती प्रदान करने लिए केवल फोम या कुशन ही नहीं बल्कि, उसके नीचे की संरचना और सपोर्ट स्ट्रक्चर भी काफी अग्रणी भूमिका निभाता है। ये भाग सीट को मजबूत बनाने के साथ यात्रियों के भार को भी वहन करता है। फिर इस पर कुशनिंग करने के बाद सीट को विनाइल से ढक दिया जाता है। पहली नजर में तो सीट को बाहर से देखने पर केवल एक कुशन दिखता है मगर इसके पीछे कई लेयर्स का इस्तेमाल होता है जो सीट को मजबूत बनाती हैं।
गौरतलब है कि, इससे पहले हमने आपको रेलवे स्टेशन पर 24 बजने वाली घड़ी यूज करने की वजह बताई थी।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।
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