काठमांडो: नेपाल सरकार के लिए फिर से मुसीबत खड़ी करते हुए सात मधेसी दलों और करीब दो दर्जन जातीय संगठनों के गठबंधन ने अधिक अधिकारों, पर्याप्त प्रतिनिधित्व और प्रांतीय सीमा के पुनर्सीमांकन से जुड़ी मांगों पर दबाव डालने के लिए फिर से आंदोलन करने का आज फैसला किया।
प्रदर्शनकारी दल कल यहां रत्नापार्क के सामने प्रदर्शन रैली और मुख्य प्रशासनिक परिसर सिंहदरबाद सचिवालय के सामने सोमवार से अनिश्चित काल के लिए धरना शुरू करेंगे। पिछले साल देश की दक्षिणी सीमा पर छह माह के संविधान विरोध कार्यक्रम करने के बाद गठबंधन ने अब अपनी रणनीति बदल ली है और सरकार एवं अन्य पक्षों का अपनी मांगों के प्रति ध्यान खींचने की कोशिश के तहत राजधानी शहर पर ध्यान केंद्रित किया है।
बड़ी मांगों में संघीय ढांचे के सात प्रांतीय मॉडल के पुनर्सीमांकन, मधेसियों समेत हाशिये पर पड़े समूहों और जातीय अल्पसंख्यकों, देशी समूहों और दलितों को राजकीय निकायों में समावेशन एवं अनुपातिक प्रतिनिधित्व शामिल हैं। यहां संवाददाता सम्मेलन में अपने आंदोलन कार्यक्रम की घोषणा करते हुए उन्होंने प्रथम संविधान संशोधन खारिज कर दिया और कहा कि यह उनकी मांगों का समाधान नहीं कर पाया है।
उन्होंने एक संयुक्त बयान में कहा कि हाल ही में वामपंथी गठबंधन सरकार द्वारा हुई विभिन्न पदों पर नियुक्ति और 21 राजदूतों की नियुक्ति से लगता है कि समावेशन की उनकी मांग पूरी करने में संसोधन विफल रहा। इस संयुक्त बयान पर फेडरल सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र यादव का हस्ताक्षर है।
ज्यादातर भारतीय मूल के मधेसी संविधान का पुनर्लेखन चाहते हैं ताकि धर्मनिरपेक्षता, पहचान आधारित समानुपातिक समावेशी प्रतिनिधित्व की अवधारणा और नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक का दर्जा संवैधानिक रूप से सुनिश्चित किया जा सके।
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