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सदी के अंत तक हिंदू कुश पर्वत से पिघल सकती 75 फीसदी बर्फ, खतरे में पड़ सकता है जीवन

ग्लोबल वॉर्मिंग पर अगर अभी ध्यान नहीं दिया गया और इससे निपटने के उपाय नहीं खोजे गए तो हालात भयावह हो सकते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक सदी के अंत तक हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियर की बर्फ 75 फीसदी तक कम हो सकती है।

ग्लेशियर से पिघलती बर्फ- India TV Hindi
Image Source : AP ग्लेशियर से पिघलती बर्फ

नई दिल्ली: अगर वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियर की बर्फ सदी के अंत तक 75 प्रतिशत तक कम हो सकती है। हिंदू कुश पर्वत के ये ग्लेशियर कई नदियों का उद्गम स्थल हैं जिनमें इन्हीं ग्लेशियर से पानी आता है। ये नदियां 2 अरब लोगों की आजीविका का साधन बनती हैं। एक नए अध्ययन में इस बारे में जानकारी सामने आई है। 

अध्ययन में क्या कहा गया?

विज्ञान पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि यदि देश तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर सके तो हिमालय और कॉकेशस पर्वत में ग्लेशियर की 40-45 प्रतिशत बर्फ संरक्षित रहेगी। अध्ययन में पाया गया कि इसके विपरीत अगर इस सदी के अंत तक दुनिया 2.7 डिग्री सेल्सियस गर्म होती है, तो वैश्विक स्तर पर ग्लेशियर की बर्फ का केवल एक-चौथाई हिस्सा ही बचेगा। 

Image Source : apहिंदू कुश ग्लेशियर

बुरी तरह प्रभावित होंगी ये पर्वत श्रृंखलाएं

अध्ययन में कहा गया है कि मानव समुदायों के लिए सबसे महत्वपूर्ण ग्लेशियर क्षेत्र जैसे कि यूरोपीयन आल्प्स, पश्चिमी अमेरिका और कनाडा की पर्वत श्रृंखलाएं तथा आइसलैंड विशेष रूप से बुरी तरह प्रभावित होंगे। 2 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ये क्षेत्र अपनी लगभग सारी बर्फ खो सकते हैं और 2020 के स्तर पर केवल 10-15 प्रतिशत ही बर्फ बची रह पाएगी। 

भयावह होगा इस पर्वत का भविष्य

स्कैंडिनेविया पर्वत का भविष्य और भी भयावह हो सकता है, क्योंकि इस स्तर के तापमान में वहां ग्लेशियर पर बर्फ बचेगी ही नहीं। अध्ययन में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि 2015 के पेरिस समझौते द्वारा निर्धारित 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य तक तापमान को सीमित करने से सभी क्षेत्रों में कुछ ग्लेशियर बर्फ को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।

Image Source : apहिंदू कुश ग्लेशियर

खतरे में पड़ सकता है जीवन

विश्व के नेता ग्लेशियरों को लेकर पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लिए ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में एकत्रित हो रहे हैं। इसमें 50 से अधिक देश भाग ले रहे हैं, जिनमें 30 देशों के मंत्री स्तरीय या उच्च स्तर के अधिकारी शामिल होंगे। एशियाई विकास बैंक के उपाध्यक्ष यिंगमिंग यांग ने दुशांबे में कहा, ‘‘पिघलते ग्लेशियर अभूतपूर्व पैमाने पर जीवन को खतरे में डाल रहे हैं, जिसमें एशिया में 2 अरब से अधिक लोगों की आजीविका भी शामिल है। ग्रह को गर्म करने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा को अपनाना ही ग्लेशियरों के पिघलने की गति को धीमा करने का सबसे प्रभावी तरीका है।’’ 

'हम जो चुनेंगे उसका असर सदियों तक रहेगा'

व्रीजे यूनिवर्सिटी ब्रसेल में अध्ययन के सह-प्रमुख लेखक डॉ हैरी जेकोलारी ने कहा, ‘‘हमारे अध्ययन से यह स्पष्ट हो गया है कि तापमान में मामूली वृद्धि भी मायने रखती है। आज हम जो चयन करेंगे, उसका असर सदियों तक रहेगा और यह तय करेगा कि हमारे ग्लेशियरों का कितना हिस्सा संरक्षित किया जा सकता है।’’ (भाषा)

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