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ढाका में हिंदुओं की हत्याएं बढ़ने के बीच दिनेश त्रिवेदी को बनाया गया बांग्लादेश का अगला हाई कमिश्नर

भारतीय जनता पार्टी के नेता दिनेश त्रिवेदी का ढाका में हिंदुओं पर बढ़ती हिंसक घटनाओं और हत्याओं के बीच बांग्लादेश का अगला हाई कमिश्नर बनाया गया है। वह जूदा हाई कमिश्नर प्रणय वर्मा का स्थान लेंगे

दिनेश त्रिवेदी (बाएं) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (दाएं)- India TV Hindi
Image Source : PTI दिनेश त्रिवेदी (बाएं) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (दाएं)

नई दिल्लीः भारतीय जनता पार्टी के नेता दिनेश त्रिवेदी का ढाका में हिंदुओं पर बढ़ती हिंसक घटनाओं और हत्याओं के बीच बांग्लादेश का अगला हाई कमिश्नर बनाया गया है। वह जूदा हाई कमिश्नर प्रणय वर्मा का स्थान लेंगे। यह नियुक्ति इसलिए खास है क्योंकि आमतौर पर इस पद पर करियर डिप्लोमेट (IFS अधिकारी) को भेजा जाता है, लेकिन इस बार एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता को चुना गया है। 

कौन हैं दिनेश त्रिवेदी

दिनेश त्रिवेदी पश्चिम बंगाल की राजनीति से गहराई से जुड़े रहे हैं। उन्होंने अपना राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू किया था। मगर बाद में वे जनता दल में गए, उसके बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में लंबे समय तक रहे और 2021 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सदस्यता ले ली। वे तीन बार लोकसभा सांसद रहे और राज्‍यसभा सदस्य भी रहे। उन्होंने बर्राकपुर (पश्चिम बंगाल) से लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया। UPA सरकार में उन्होंने रेल मंत्री के रूप में सेवा की और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री भी रहे। 2012 में रेल बजट पेश करते समय उन्होंने किराए बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था, जिस पर काफी विवाद हुआ था और अंत में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। 

दिनेश त्रिवेदी को भारत ने क्यों बनाया हाई कमिश्नर

दिनेश त्रिवेदी को नीति-आधारित फैसलों के लिए जाना जाता है। 75 वर्षीय त्रिवेदी को ढाका भेजने का फैसला भारत-बांग्लादेश संबंधों को नई दिशा देने का संकेत माना जा रहा है। साल 2024 में बांग्लादेश की  तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के अपदस्थ किए जाने और तख्तापलट के बाद से भारत और बांग्लादेश के रिश्ते तनावपूर्ण हो गए हैं। अब तारिक रहमान बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री हैं।

दिनेश त्रिवेदी पश्चिम बंगाल की गहरी जड़ों से जुड़े हैं, वे बांग्ला भाषा-संस्कृति से परिचित होने और अपने राजनीतिक अनुभवों से दोनों देशों के बीच सीमा, व्यापार, ऊर्जा, शरणार्थी और सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों को संभालने में मददगार साबित हो सकते हैं। यह नियुक्ति भारतीय विदेश नीति में एक नई परंपरा की शुरुआत भी मानी जा रही है, जिसमें पड़ोसी देशों में राजनीतिक अनुभव वाले व्यक्तियों को महत्वपूर्ण राजनयिक पदों पर भेजा जा रहा है।

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