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इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की कुर्सी खतरे में? ये 4 चेहरे बदल सकते हैं पूरा खेल

इजरायल के आगामी चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता को कड़ी चुनौती मिल सकती है। गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट, इतामार बेन-ग्विर और मंसूर अब्बास जैसे नेता चुनावी नतीजों और गठबंधन की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

इजरायल चुनावों में इस...- India TV Hindi
Image Source : AP इजरायल चुनावों में इस बार काफी कड़े मुकाबले की उम्मीद जताई जा रही है।

Highlights

  • हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले के तीन साल बाद इजरायल में होने जा रहा है अहम चुनाव।
  • बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के बीच कड़ी टक्कर के संकेत दे रहे हैं सर्वे।
  • इतामार बेन-ग्विर से मंसूर अब्बास तक, कई नेताओं की भूमिका तय करेगी अगली सरकार की दिशा।

यरुशलम: इजरायल में अगले हफ्ते 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। हमास के नेतृत्व में 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमलों के बाद देश में युद्ध और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। अब मतदाता तय करेंगे कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को एक और कार्यकाल दिया जाए या देश की राजनीति में बदलाव का रास्ता खोला जाए। चुनावी सर्वेक्षणों में नेतन्याहू की राष्ट्रवादी लिकुड पार्टी और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली मध्यमार्गी याशार! पार्टी के बीच कड़ी टक्कर के संकेत मिल रहे हैं।

कैसे बनती है इजरायल में सरकार?

इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। इसके बाद पार्टियां गठबंधन बनाकर सरकार बनाने की कोशिश करती हैं। देश की 120 सदस्यीय संसद को नेसेट कहा जाता है। अब तक किसी भी एक पार्टी को अपने दम पर संसद में बहुमत नहीं मिला है। इसलिए चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए अलग-अलग दलों का समर्थन जुटाना जरूरी होता है। इस बार भी पार्टियों के बीच गठबंधन और आपसी समझौते सरकार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

Image Source : APबेंजामिन नेतन्याहू के सामने इस बार कड़ी चुनौती है।

सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं नेतन्याहू

बेंजामिन नेतन्याहू 77 साल के हैं और इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। वह लिकुड पार्टी के प्रमुख हैं और लंबे समय से देश की राजनीति पर उनका दबदबा रहा है। युद्ध, राजनीतिक संकट, विवादों और 7 अक्टूबर 2023 के हमलों जैसी घटनाओं के बावजूद वह सत्ता में बने रहने की कोशिश करते रहे हैं। उनके समर्थक राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उनके रिकॉर्ड को अहम मानते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनके करीबी संबंध भी उनके समर्थकों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा हैं। ट्रंप ने भी नेतन्याहू का समर्थन किया है।

नेतन्याहू पर सुरक्षा में चूक और कानूनी मामलों के आरोप

नेतन्याहू के विरोधियों का कहना है कि 7 अक्टूबर 2023 के हमलों से पहले सुरक्षा और सरकारी नीतियों में हुई नाकामियों की जिम्मेदारी उनकी है। वे युद्ध के संचालन को लेकर भी प्रधानमंत्री की आलोचना करते हैं। वर्ष 2024 में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने नेतन्याहू के खिलाफ युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोपों को लेकर गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। इसके अलावा, इजरायल में वह कई वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद का सामना कर रहे हैं। उन पर धोखाधड़ी, विश्वास के उल्लंघन और रिश्वत लेने के आरोप हैं। नेतन्याहू ने सभी आरोपों से इनकार किया है।

Image Source : APगादी आइजेनकोट कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।

पूर्व सैन्य प्रमुख और नेतन्याहू के बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं आइजेनकोट

66 साल के गादी आइजेनकोट इजरायल की सेना के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह मोरक्को से आए यहूदी प्रवासियों के एक कामकाजी परिवार में पैदा हुए थे। उन्होंने करीब 4 दशक तक सेना में काम किया और धीरे-धीरे सर्वोच्च सैन्य पद तक पहुंचे। वर्ष 2022 में राजनीति में आने के बाद वह अब मध्यमार्गी याशार! पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसे देश का सबसे बड़ा विपक्षी दल बताया गया है। 7 अक्टूबर के हमलों के बाद गाजा में हुई लड़ाई के दौरान उनके बेटे और 2 भतीजे भी मारे गए। इस व्यक्तिगत नुकसान ने उनकी राजनीतिक और सार्वजनिक छवि को भी प्रभावित किया है।

युद्ध की रणनीति पर नेतन्याहू से हैं आइजेनकोट के मतभेद

आइजेनकोट नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट में पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल हुए थे। हालांकि, करीब 8 महीने बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनका आरोप था कि प्रधानमंत्री के पास युद्ध को लेकर स्पष्ट रणनीति नहीं है। इसके बाद उन्होंने खुद को नेतन्याहू के मुकाबले एक मध्यमार्गी विकल्प के रूप में पेश किया, हालांकि सुरक्षा के मुद्दे पर उनका रुख अब भी सख्त है। आइजेनकोट को इजरायल की तथाकथित 'दहिया डॉक्ट्रिन' तैयार करने का श्रेय दिया जाता है।

'दहिया डॉक्ट्रिन' में उन इलाकों में भारी और असमानुपातिक सैन्य ताकत इस्तेमाल करने की बात शामिल है, जहां से लड़ाके हमले करते हैं। अगर वह गठबंधन बनाकर सरकार बनाने में सफल होते हैं, तो वह मिजराही मूल के इजरायल के पहले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। मिजराही समुदाय में उत्तर अफ्रीका और मध्य पूर्व से जुड़े यहूदी शामिल हैं। इस समुदाय को ऐतिहासिक रूप से यूरोपीय मूल के प्रभावशाली वर्ग से भेदभाव का सामना करना पड़ा है।

Image Source : APनफ्ताली बेनेट चुनावों में कमाल दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री और दक्षिणपंथी नेता नफ्ताली बेनेट भी रेस में

54 साल के नफ्ताली बेनेट दक्षिणपंथी और धार्मिक विचारों वाले नेता हैं। वह मध्यमार्गी नेता यायर लैपिड के साथ मिलकर 'बेयाखाद' यानी 'साथ मिलकर' नाम के संयुक्त चुनावी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं। बेनेट फिलिस्तीन को स्वतंत्र देश बनाने का विरोध करते हैं और कब्जे वाले वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के निर्माण का समर्थन करते हैं। वर्ष 2013 में नेसेट में पहुंचने से पहले बेनेट नेतन्याहू के चीफ ऑफ स्टाफ रह चुके थे। वह येशा काउंसिल के प्रमुख भी रहे, जो इजरायली बस्तियों के भीतर स्थानीय प्रशासनिक निकायों का संगठन है। उनकी रूढ़िवादी यामिना पार्टी ने 7 सीटें जीती थीं। इन सीटों की मदद से उन्होंने वामपंथी और अरब दलों के समर्थन वाला गठबंधन बनाया था।

नेतन्याहू से मतभेद, फिलिस्तीन पर सख्त रुख

बेनेट ने 2021 में सत्ता-साझेदारी के समझौते के तहत प्रधानमंत्री का पद संभाला था। इस व्यवस्था में यायर लैपिड भी शामिल थे। हालांकि, नेतन्याहू की तरह फिलिस्तीनियों के प्रति सख्त रुख रखने के बावजूद बेनेट के उनके साथ गंभीर मतभेद हैं। दोनों नेताओं के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों और इजरायल की कानूनी व्यवस्था के खिलाफ नेतन्याहू की लड़ाई को लेकर असहमति रही है। चुनाव में बेनेट और लैपिड का संयुक्त गठबंधन नेतन्याहू विरोधी वोटों को एकजुट करने में कितनी सफलता हासिल करता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

Image Source : APइतामार बेन-ग्विर को कट्टर दक्षिणपंथी विचारों के लिए जाना जाता है।

कट्टर दक्षिणपंथी नेता इतामार बेन-ग्विर ने भी ठोकी ताल

50 साल के इतामार बेन-ग्विर इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री हैं। वह अपने कट्टर दक्षिणपंथी विचारों और विवादित बयानों के लिए जाने जाते हैं। उन्हें कई मामलों में दोषी ठहराया जा चुका है, जिनमें एक आतंकवादी संगठन का समर्थन करने से जुड़ा मामला भी शामिल है। वह 'ओत्जमा येहुदित' यानी 'यहूदी शक्ति' नाम की अति-राष्ट्रवादी पार्टी के प्रमुख हैं। पिछले चुनाव में उनकी पार्टी के अच्छे प्रदर्शन ने उन्हें कैबिनेट में जगह दिलाने में मदद की थी। पेशे से वकील बेन-ग्विर ने फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा के आरोपी दक्षिणपंथी यहूदी चरमपंथियों का कोर्ट में बचाव करके पहचान बनाई।

फिलिस्तीनियों के पलायन और गाजा में बस्तियों की वकालत

किशोरावस्था में बेन-ग्विर को सेना ने उनके चरमपंथी विचारों के कारण भर्ती करने से इनकार कर दिया था। वह मीर कहाने के अनुयायी भी रहे, जो एक नस्लवादी विचारधारा वाले रब्बी थे और इजरायल, गाजा तथा वेस्ट बैंक से फिलिस्तीनियों को बाहर निकालने की वकालत करते थे। बेन-ग्विर ने गाजा पट्टी से लगभग 20 लाख फिलिस्तीनियों के कथित 'स्वैच्छिक' पलायन की योजना का समर्थन किया है। उन्होंने गाजा में यहूदी बस्तियों को दोबारा बसाने की भी वकालत की है। उनके विचार इजरायल की राजनीति में दक्षिणपंथी खेमे की सख्त नीतियों को दर्शाते हैं। चुनाव के बाद उनकी पार्टी को मिलने वाली सीटें सरकार की नीतियों और नेतन्याहू के गठबंधन की दिशा पर असर डाल सकती हैं।

Image Source : APमंसूर अब्बास इजरायल में अरब समुदाय से जुड़े मुद्दे सामने रखते रहे हैं।

अरब समुदाय की आवाज बने हुए हैं मंसूर अब्बास

52 साल के मंसूर अब्बास फिलिस्तीनी-अरब मूल के इजरायली नेता और पेशे से डेंटिस्ट हैं। वह उत्तरी इजरायल से आते हैं और 'राअम' नाम की इस्लामवादी पार्टी का नेतृत्व करते हैं। वर्ष 2021 में उनकी पार्टी इजरायल की सरकार में शामिल होने वाली पहली अरब नेतृत्व वाली पार्टी बनी थी। यह इजरायली राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था, क्योंकि इससे अरब राजनीतिक दलों की गठबंधन सरकार बनाने में भूमिका बढ़ी।

अब्बास की रणनीति इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष जैसे बड़े और विवादित मुद्दों के बजाय स्थानीय समस्याओं पर ध्यान देने की रही है। वह अरब समुदायों में अपराध पर रोक लगाने और आम लोगों से जुड़े दूसरे मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं। उनका मानना है कि इस तरह उनकी पार्टी को संसद में अधिक सीटें मिल सकती हैं और भविष्य में सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों के साथ समझौते की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

राअम में यहूदी नेता को भी मिली अहम जगह

अपनी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए अब्बास ने पूर्व पुलिस कमांडर और मध्यमार्गी यहूदी नेता योआव सेगलोविट्ज को राअम की चुनावी सूची में दूसरे स्थान पर रखा है। इससे पार्टी के स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देने और व्यापक समर्थन जुटाने के प्रयासों का संकेत मिलता है। अब्बास वर्ष 2019 से नेसेट के सदस्य हैं। चुनाव के बाद उनकी पार्टी की सीटें सरकार बनाने के लिए अहम साबित हो सकती हैं, खासकर तब जब किसी भी बड़े दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता।

इजरायल चुनाव का नतीजा क्यों होगा अहम?

इजरायल का आगामी चुनाव केवल प्रधानमंत्री चुनने की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा नीति, गाजा युद्ध से जुड़े फैसलों, फिलिस्तीनियों के प्रति रुख और घरेलू राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है। नेतन्याहू के समर्थक उनके अनुभव और सुरक्षा संबंधी रिकॉर्ड पर भरोसा जता रहे हैं, जबकि उनके विरोधी युद्ध प्रबंधन और सुरक्षा में हुई चूकों को मुद्दा बना रहे हैं। दूसरी ओर, आइजेनकोट खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में पेश कर रहे हैं। बेनेट, बेन-ग्विर और अब्बास जैसे नेताओं की पार्टियां भी चुनाव के बाद गठबंधन की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। (AP से इनपुट्स के साथ)

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