बर्लिन: जर्मनी द्वारा एक उइगर युवक को चीन निर्वासित किए जाने का मामला सामने आया है। युवक की मां ने दावा किया है कि चीन पहुंचते ही उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की गई। इस घटना के बाद उइगर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि चीन में उइगर समुदाय के साथ पहले से ही सख्त कार्रवाई होती रही है, इसलिए इस तरह का निर्वासन गंभीर चिंता का विषय है। 21 साल के अराफात आदिल चीन और तुर्किये दोनों देशों की नागरिकता रखते हैं। उनकी मां गुजेलाय आदिल ने बताया कि उनका परिवार वर्ष 2017 में चीन छोड़कर तुर्किये आ गया था।
निर्वासन की नहीं हुई आधिकारिक पुष्टि
गुजेलाय आदिल ने बताया कि अराफात जर्मनी में शरण मांग रहे थे, लेकिन मंगलवार को उन्हें फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट से चीन भेज दिया गया। उन्होंने बताया कि उनका बेटा बुधवार सुबह बीजिंग पहुंचा, जहां उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की गई। उन्होंने उम्मीद जताई कि गुरुवार देर रात उसे इस्तांबुल जाने वाली उड़ान में बैठने की इजाजत मिल जाएगी। गुजेलाय ने कहा, 'अगर मेरा बेटा तुर्किये वापस नहीं लौट पाया तो उसके साथ क्या होगा, मुझे नहीं पता। मैं बस अपने बच्चे को फिर से देखना चाहती हूं।' हालांकि, जर्मनी और चीन के अधिकारियों ने इस निर्वासन की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
Image Source : APचीन से उइगरों पर अत्याचार की खबरें आती रहती हैं।
उइगर अधिकार कार्यकर्ताओं ने जताई चिंता
इस घटना के सामने आने के बाद उइगर अधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि चीन के शिनजियांग क्षेत्र में पिछले कई सालों से उइगर मुसलमानों और अन्य जातीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही है। शिनजियांग में करीब 1.1 करोड़ उइगर और अन्य अल्पसंख्यक रहते हैं। वर्ष 2017 से चीन पर वहां बड़े पैमाने पर उइगरों को हिरासत में रखने और जबरन मजदूरी कराने जैसे आरोप लगते रहे हैं। इससे पहले भी इस क्षेत्र में समय-समय पर अशांति की घटनाएं होती रही हैं और यही वजह है कि अमेरिका समेत कई देश उइगरों को अपने यहां शरण देते रहे हैं।
'उइगरों के निर्वासन पर कोई पूर्ण रोक नहीं'
नॉर्वे स्थित गैर-लाभकारी संगठन उइगर हेल्प के संस्थापक अब्दुवेली आयुप ने कहा कि एक और उइगर को चीन भेजे जाने की खबर बेहद दुखद है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ के प्रमुख सदस्य जर्मनी का यह कदम गलत उदाहरण पेश करता है, जिससे चीन के भीतर और बाहर रह रहे उइगरों की उम्मीदें कमजोर पड़ रही हैं। फ्रैंकफर्ट जिस जर्मन राज्य हेसे में स्थित है, वहां के गृह मंत्रालय ने समाचार एजेंसी द्वारा भेजे गए सवालों का तत्काल कोई जवाब नहीं दिया। वहीं, जर्मनी के गृह मंत्रालय ने कहा,
'सामान्य तौर पर चीन भेजे जाने वाले उइगरों के निर्वासन पर कोई पूर्ण रोक नहीं है। हालांकि, संघीय प्रवासन और शरणार्थी कार्यालय (BAMF) की मौजूदा नीति यह कहती है कि यदि किसी व्यक्ति का मूल देश चीन है और वह उइगर है, तो सामान्य रूप से उसे सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।'
उधर, चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इस मामले पर पूछे गए सवालों का तत्काल कोई जवाब नहीं दिया।
जर्मनी में पहले भी सामने आ चुका है ऐसा मामला
अराफात आदिल की मां ने बताया कि उनके बेटे को 2024 में तुर्किये का पासपोर्ट भी मिल गया था। उन्होंने कहा कि समझ नहीं आता कि जर्मनी ने उनके बेटे को तुर्किये भेजने के बजाय चीन क्यों भेजा, जबकि उसके पास दोनों देशों के वैध पासपोर्ट थे। यह भी साफ नहीं हो सका है कि अराफात ने जर्मनी में किस आधार पर शरण मांगी थी। जर्मनी तुर्किये को सुरक्षित मूल देश मानता है। यह पहली बार नहीं है जब ऐसा मामला सामने आया हो। पिछले साल नवंबर में भी जर्मनी ने रेजीवांगुली बैकेली नाम की एक उइगर महिला को गलती से तुर्किये की बजाय चीन भेज दिया था। जर्मन पत्रिका डेर श्पीगल के अनुसार यह एक प्रशासनिक गलती थी। हालांकि, वह महिला कुछ समय बाद बीजिंग से तुर्किये चली गई थी।
उइगरों को वापस भेजने का दबाव बनाता है चीन
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन लंबे समय से दूसरे देशों पर दबाव बना रहा है कि वे चीन छोड़कर भागे उइगर नागरिकों को वापस भेजें। इसी क्रम में फरवरी 2025 में थाईलैंड ने भी कम से कम 40 उइगरों को चीन वापस भेज दिया था, जिसे हाल के वर्षों की सबसे चर्चित निर्वासन घटनाओं में से एक माना गया था।
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