1967 12 जनवरी की शाम तीन लोग मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर जैम्स बेडफ़ोर्ड के शव से जूझ रहे थे जिनका किडनी कैंसर से 72 साल की उम्र में देहांत हो गया था। अमेरिका के राज्य कैलिफ़ोर्निया के एक अस्पताल में जिस तरह से बेडफ़ोर्ड का निधन हुआ था उसमें कुछ भी अस्वाभाविक नही था लेकिन उसके बाद जो हुआ वो तो बिल्कुल स्वाभाविक नहीं था।
बेडफ़ोर्ड दुनिया के पहले ऐसे व्यक्ति बनने जा रहे थे जिनका शव सहजकर रखा जा रहा था, इस उम्मीद से कि एक दिन वह जीवित हो उठेंगे। उनका शव अब अरिज़ोना में लिक्विड नाइट्रोजन में रखा हुआ है।
डेलीमेल के अनुसार बेडफ़ोर्ड के शव को सहेजने की प्रक्रिया से जुड़े वैज्ञानिक रॉबर्ट नेल्सन ने बताया कि बेडफ़ोर्ड ने मरने के पहले कभी नही कहा था कि उन्हें फिर ज़िंदा होने की कोई उम्मीद है लेकिन उन्हें पूरा यक़ीन है कि बेडफ़ोर्ड एक दिन ज़रुर जिंदा हो जाएंगे।जब हमने बेडफ़ोर्ड को जमाया था तब इंसान न तो चांद पर गया था, ह्दय प्रत्यारोपण नही हुआ था, कोई GPS नबी था और न ही सेलफ़ोन थे। किसे पता आगे 50 साल के बाद क्या होने वाला है। हमारी उम्मीद nanotechnology पर टिकी है और कभी न कभी उसे वापस लाने का ज़रिया बनेगा।
James Bedford, Robert nelson
क्या है nanotechnology
पहले के जमाने में सूक्ष्म कणों को देखने के लिए और उन पर काम करने के लिए आज के जितने साधन भी नहीं थे इस वजह से उनके बारे में अधिक समझ पाना संभव भी नहीं था लेकिन अभी विज्ञानं इतना उन्नत हो गया है कि वो इस दिशा में काम कर रहा है और रोज नये तरह के शोध हो रहे है जिसकी वजह से इस तकनीक को यानि Nanotechnology को एक नई दिशा मिली है।
बहरहाल नेल्सन का सपना साकार होता है या नही ये तो वक्त बताएगा लेकिन उनकी इस अनोखी कहानी पर हॉलीवुड फ़िल्म ज़रुर बन रही है।
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