वाशिंगटन: भारतीय मूल के शोधकर्ताओं सहित शोधकर्ताओं के एक दल ने चट्टानों की संरचना में पाए जाने वाली उस सामग्री की खोज की है, जो पृथ्वी के निर्माण के शीघ्र अस्तित्व में आई थी। यह खोज वैज्ञानिकों को हमारे ग्रह की संरचना की प्रारंभिक अवधि की प्रक्रियाओं और करीब 4.5 अरब साल से जारी इसकी आंतरिक गतिशीलता को समझने में मददगार साबित होगी।
युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया का शोध दल पृथ्वी के अस्तित्व में आने के दौरान जल्दी-जल्दी पिघल रहे पदार्थो में सुरक्षित बचे पदार्थो के भूगर्भीयरसायन चिन्ह खोजने में सक्षम रहे हैं। उन्होंने उत्तरी कनाडा के बैफिन द्वीप और प्रशांत महासागर के ओनटोंग जावा पठार से अपेक्षाकृत नवीन चट्टानें खोजी है।
ये चट्टान संरचनाएं फ्लड बसाल्ट्स (यह एक विशाल ज्वालामुखी विस्फोट या विस्फोट की श्रृंखला का परिणाम है ) कही जाती हैं, क्योंकि ये भारी मात्रा में लावा निकलने से निर्मित हुई हैं। यह जमा हुआ लावा केवल छह करोड़ वर्ष से 12 करोड़ वर्ष पुराना है। लेकिन शोध दल के मुताबिक पृथ्वी के अंदर पिघला हुआ पदार्थ बेसाल्ट चट्टानों के मैदानों के निर्माण के दौरान बच गया होगा और यह प्रक्रिया 4.5 अरब साल पहले हुई थी।
पृथ्वी के आंतरिक भाग में इन पदार्थो की मौजूदगी को देखकर शोधार्थी चकित रह गए थे। यह शोध साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। पृथ्वी ग्रह का निर्माण लगभग 4.54 अरब वर्ष पूर्व हुआ था और इस घटना के एक अरब वर्ष पश्चात यहा जीवन का विकास शुरू हो गया था।
पृथ्वी के जैवमंडल ने यहां के वायु मण्डल में काफ़ी परिवर्तन किया है। समय बीतने के साथ ओजोन पर्त बनी जिसने पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के साथ मिलकर पृथ्वी पर आने वाले हानिकारक सौर विकरण को रोककर इसको रहने योग्य बनाया।
पृथ्वी सभी चार सौर भौमिक ग्रहों में द्रव्यमान और आकार में सबसे बड़ी है। अन्य तीन भौमिक ग्रह हैं- बुध, शुक्र और मंगल। इन सभी ग्रहों में पृथ्वी का घनत्व, गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकीय क्षेत्र और घूर्णन सबसे ज्यादा है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी सौर नीहारिका के अवशेषों से अन्य ग्रहों के साथ ही बनी।
इसका अंदरूनी हिस्सा गर्मी से पिघला और लोहे जैसे भारी तत्व पृथ्वी के केन्द्र में पहुंच गए। लोहा व निकिल गर्मी से पिघल कर द्रव में बदल गए और इनके घूर्णन से पृथ्वी दो ध्रुवों वाले विशाल चुंबक में बदल गई। बाद में पृथ्वी में महाद्वीपीय विवर्तन या विचलन जैसी भूवैज्ञानिक क्रियाएं पैदा हुई। इसी प्रक्रिया से पृथ्वी पर महाद्वीप, महासागर और वायुमंडल आदि बने।
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