संयुक्त राष्ट्र: दुनिया भर के गरीबों के लिए एचआईवी और एड्स जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए जेनरिक दवाएं बनाने की इजाजत देने की भारत की नीति को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की स्वीकृति मिल गई है।
भारत ने बौद्धिक संपदा कानूनों में लचीलेपन का इस्तेमाल करते हुए ऐसा किया है। भारत ने आम सभा को आश्वस्त किया है कि वह विकासशील देशों को दवाओं की जीवन रक्षक दवाएं मुहैया कराना जारी रखेगा।
संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की एचआईवी एवं एड्स पर एक उच्चस्तरीय बैठक में बुधवार को राजनीतिक घोषणापत्र को स्वीकार किया गया कि सुरक्षित, प्रभावी और सस्ती दवाओं तक पहुंच एक बुनियादी अधिकार है। सभी देशों से आग्रह किया गया कि वे यह सुनिश्चित करें कि व्यापार करार में बौद्धिक संपदा अधिकार के प्रावधान जेनरिक दवाएं मुहैया कराने के वर्तमान रास्ते को नष्ट नहीं करें।
एचआईवी यानी ह्यूमन इम्युनोडिफिसिएन्सी वायरस ही एड्स का कारण बनता है।
देशों से आग्रह किया गया है कि व्यापार से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप) के करार में लचीलेपन का इस्तेमाल करें। खासकर सामान तक लोगों की पहुंच को बढ़ावा देने और दवाओं के व्यापार के मामले में ऐसा करें।
भारत के स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने बैठक में कहा कि भारतीय औषधि उद्योग ने एचआईवी/एड्स के इलाज के लिए काम आने वाले 80 फीसदी से अधिक दवाओं की आपूर्ति कर लाखों लोगों का जीवन बचाने में मदद की है।
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