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विशेष अभियानों में महिलाओं को लेने से अमेरिकी कमांडोज का इंकार

अमेरिकी सेना के सबसे खतरनाक कामों में तैनात जवान राजनीतिक परिशुद्धता या लैंगिक समानता की ज्यादा परवाह नहीं करते और उनके पास अपने राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक संदेश है।

US Army- India TV Hindi
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वाशिंगटन: अमेरिकी सेना के सबसे खतरनाक कामों में तैनात जवान राजनीतिक परिशुद्धता या लैंगिक समानता की ज्यादा परवाह नहीं करते और उनके पास अपने राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक संदेश है। जब वे कहीं से छिपकर लड़ रहे होते हैं या युद्ध के मैदान में खून बहा रहे होते हैं तब इनके दलों में महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं होता। रैंड कॉर्प द्वारा कराए गए स्वैच्छिक सर्वेक्षण को मिले स्पष्ट और सपाट जवाबों में अमेरिका के विशेष अभियान बलों के 7600 से ज्यादा लोगों ने लगभग एक ही बात कही है। नेवी सील, आर्मी डेल्टा या अन्य कमांडो इकाइयों में यदि महिलाओं को सेवाएं देने का मौका दिया जाता है तो इससे इनकी प्रभावशीलता पर असर पड़ सकता है और स्तर कम हो सकता है। यह पुरूषों को जोखिमपूर्ण पदों से दूर कर सकता है।

रैंड सर्वेक्षण में जवाब देने के लिए राजी होने वाले लोगों में से अधिकतर का यह कहना है कि उनका मानना है कि महिलाओं में वह शारीरिक शक्ति या मानसिक मजबूती नहीं होती कि वे दुष्कर कार्यों को अंजाम दे सकें। इस सर्वेक्षण के कुछ व्यापक निष्कर्षों को असोसिएटेड प्रेस द्वारा इस साल की शुरूआत में जारी किया गया था लेकिन विस्तृत परिणाम और जवाब देने वालों की टिप्पणियां जारी नहीं की गईं। सर्वेक्षण मई से जुलाई 2014 तक किया गया था। पेंटागन ने ग्रीष्मकालीन सर्वेक्षण और दस्तावेजों को एक ऐसे समय पर जारी किया जब पिछले ही सप्ताह रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर ने सभी लड़ाकू भूमिकाओं को महिलाओं के लिए खोलने की घोषणा की थी।

सर्वेक्षण में शामिल एक व्यक्ति ने लिखा, मेरा वजन 102 किलो है और पूरी किट के साथ वजन 127 किलो हो जाता है। मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी टीम का हर व्यक्ति टीम के किसी अन्य सदस्य को गोलियांे से बचाने के लिए घसीटकर ले जाने में सक्षम हो। 60 किलो वजन वाली महिला चाहे जिम में कितना ही समय क्यों न बिताती हो, वह ऐसा नहीं कर सकती। क्या हम किसी घायल व्यक्ति का खून सिर्फ इसलिए बह जाने देंगे कि एक महिला सैनिक उसे सुरक्षित स्थान तक खींचकर नहीं ला पाई। एक अन्य ने कहा कि लड़ाइयों को नेता नहीं जीता करते। उन्होंने कहा, जब गोलियां चल रही हों, तब लैंगिक समानता का विकल्प नहीं होता।

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