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जब आप लगातार कम सोते हैं तो इससे दिमाग पर कैसा असर पड़ता है? जानें एक्सपर्ट की राय

आजकल कम सोना ज़्यादातर लोगों की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं लम्बे समय तक ऐसा करना दिमाग के लिए कितना खतरनाक ही सकता है? चलिए डॉक्टर से जानते हैं कम नींद से ब्रेन पर क्या असर पड़ता है?

कम नींद का दिमाग पर असर- India TV Hindi
Image Source : UNSPLASH कम नींद का दिमाग पर असर

अगर आप रोजाना कम नींद लेते हैं या आधी रात तक जागते हैं तो हो सकता है कि शुरुआत में आपको कोई संकेत न दिखाई दें। लेकिन ये आदत धीरे धीरे दिमाग को कमजोर कर रही होती है। दरअसल, कम नींद की वजह से सिर्फ़ दिमाग थकता नहीं है, बल्कि उसकी काम करने की क्षमता भी कम हो जाती है। नोएडा स्थित फोर्टिस हॉस्पिटल में सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट एवं यूनिट हेड, डॉक्टर नेहा पंडिता, कहती हैं कि नींद के दौरान दिमाग़ जानकारी को प्रोसेस करता है, यादों को पक्का करता है और फ़ैसले लेने की क्षमता को कंट्रोल करने वाले सिस्टम को ठीक रखता है। लेकिन जब आप लगातार नींद कम लेते हैं तो इससे आपके दिमाग पर बुरा प्रभाव पड़ने लगता है।

कम नींद लेने से दिमाग पर कैसा असर पड़ता है?

  • ध्यान देने की क्षमता पर असर: कम नींद लेने से सबसे पहले ध्यान देने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। नींद की कमी वाले लोगों में ध्यान बनाए रखना और लगातार सही प्रतिक्रिया देना मुश्किल हो जाता है। हो सकता है कि आप रोज़मर्रा के काम तो पूरे कर लें, लेकिन आपका ध्यान आसानी से भटक सकता है। इस स्थिति में कोई व्यक्ति काम करने में खुद को सक्षम महसूस कर सकता है, लेकिन सामान्य से ज़्यादा छोटी-छोटी गलतियां कर सकता है।

  • हर समय चिड़चिड़ापन महसूस होना: कई रातों तक ठीक से न सो पाने के बाद, छोटी-सी बात में भी लोग ज़्यादा परेशान हो सकते हैं। नींद की कमी से भावनाओं को संभालने की क्षमता पर असर पड़ सकता है, जिससे लोग ज़्यादा चिड़चिड़े या कम सब्र वाले हो सकते हैं। यानी कभी-कभी जिसे हम "खराब मूड" कहते हैं, वह असल में दिमाग का बिना ठीक से आराम किए काम करते रहने का नतीजा होता है।

  • ठीक से कोई भी निर्णय नहीं ले पाना: कम नींद की वजह से आपके फ़ैसले लेने की क्षमता में भी बदलाव देखा जा सकता है। जब दिमाग को पूरी नींद नहीं मिलती, तो  सही फ़ैसला लेने, समस्या सुलझाने और सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।

कितनी नींद है ज़रूरी?

डॉक्टर नेहा पंडिता कहती हैं कि नींद को काम और जागने के बीच का बचा हुआ समय नहीं समझना चाहिए। यह वह समय है जब दिमाग अगले दिन के काम के लिए खुद को तैयार करता है। इसलिए वयस्कों के लिए आम तौर पर सात या उससे ज़्यादा घंटे की नींद की सलाह दी जाती है, हालाँकि हर व्यक्ति की ज़रूरतें अलग-अलग होती हैं। नींद का रेगुलर होना और उसकी क्वालिटी भी मायने रखती है।

Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।)

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