Rajat Sharma's Blog | मनुस्मृति: योगी ने कैसे राहुल को जवाब दिया
योगी ने कहा, मनुस्मृति पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए, जो गलत बातें हैं, वो भी बतानी चाहिए, लेकिन जो अच्छी बातें हैं, उनकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। योगी ने कहा कि राहुल भारत की पारिवारिक व्यवस्था को खत्म करना चाहते हैं, इसलिए वह मनुस्मृति की गलत व्याख्या कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कल उस विषय पर बात की, जिस पर राजनीति तो बहुत होती है, लेकिन नेता साफ-साफ बात करने से डरते हैं। योगी मनुस्मृति पर खुलकर बोले, राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली में बोले। राहुल ने पुणे में महिलाओं से मनुस्मृति की गुलामी वाली मानसिकता की ज़ंजीर तोड़ने का आह्वान किया था। योगी ने कहा, मनुस्मृति पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए, जो गलत बातें हैं, वो भी बतानी चाहिए, लेकिन जो अच्छी बातें हैं, उनकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। योगी ने कहा कि राहुल भारत की पारिवारिक व्यवस्था को खत्म करना चाहते हैं, इसलिए वह मनुस्मृति की गलत व्याख्या कर रहे हैं।
पुणे में राहुल ने कहा था कि मनुस्मृति में कहा गया है, बचपन में महिला को अपने पिता के अधीन, जवानी में अपने पति के अधीन और पति की मौत के बाद अपने बेटों के अधीन रहना चाहिए, स्त्री को कभी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए। राहुल ने कहा था कि मनुस्मृति में लिखी ये बातें बेहद शर्मनाक हैं। योगी ने कहा, मनुस्मृति में समाज में हर व्यक्ति के कर्तव्य बताए गए हैं। हो सकता है इसमें कुछ बातें आज के ज़माने में गलत लगें, लेकिन ये भी सही है कि महिला के बिना परिवार नहीं हो सकता। योगी ने पूछा, क्या मां के बिना बेटे का अस्तित्व हो सकता है? क्या पिता का अस्तित्व बेटी के बिना हो सकता है? क्या पति का कोई अस्तित्व पत्नी के बगैर हो सकता है?
असल में राहुल ने महिलाओं को लेकर जो बयानबाजी की, वह मनुस्मृति के 9वें अध्याय पर आधारित है। इसके एक श्लोक में महिलाओं की सुरक्षा की बात कही गई है। लिखा गया है कि महिलाओं को पुरुषों के नियंत्रण में रखना चाहिए। इसी अध्याय के एक दूसरे श्लोक में कहा गया है कि महिला बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में बेटों की सुरक्षा में रहती हैं। ये वाकई original मनुस्मृति में है या नहीं, इसको लेकर विवाद है। कुछ विद्वानों का कहना है कि एक अंग्रेज़ विद्वान ने मनुस्मृति में ये बातें जोड़ दी थीं लेकिन अगर किसी ज़माने में किसी ग्रंथ में कुछ गलत बातें कहीं गईं, तो उनकी आलोचना करने में, उनका विरोध करने में कोई समस्या नहीं है।
लेकिन राहुल गांधी ने कुछ गिनी-चुनी बातों को उद्धृत किया। दरअसल मनुस्मृति में कुल बारह अध्याय हैं, 2,664 श्लोक हैं। इसमें पूरा न्यायशास्त्र है, राजनीतिक व्यवस्था का जिक्र है, राजा और प्रजा के कर्तव्यों का वर्णन है। महिलाओं और वर्ण व्यवस्था को लेकर जो बातें कही गई है, वो आज के ज़माने के हिसाब से ठीक नहीं हैं, इसीलिए योगी ने कहा कि आधी बात बताना, अधूरा सच सामने पेश करके मनुस्मृति को सियासी हथियार बनाना ठीक नहीं है। ये बात सही भी है क्योंकि मनुस्मृति का नाम लेकर तमाम नेता बयानबाजी करते हैं। इसे महिलाओं और दलितों के खिलाफ एक ब्राह्मणवादी ग्रन्थ बताते हैं। इसका इस्तेमाल महिलाओं और दलितों को भड़काने के लिए किया जाता है, लेकिन ये भी सच है कि सनातन में तो कहा गया है, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता'। अर्थात, जहां नारी की पूजा होती है, देवता वहीं निवास करते हैं।
लेकिन हमें बात नए ज़माने की करनी चाहिए। बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद महिलाओं को तीन करोड़ घर उनके अपने नाम से मिले, महिलाओं के लिए 16 करोड़ शौचालय बने, महिलाओं के लिए उज्ज्वला गैस योजना शुरू की गई, महिलाओं के करीब 32 करोड़ से ज्यादा जन-धन बैंक खाते खुले ताकि digitally सारा पैसा उनके नाम पर transfer हो सके। अगर ये आंकड़े सही हैं, तो फिर कम से कम राहुल गांधी ये नहीं कह सकते कि मोदी की सरकार बनने के बाद महिलाओं को अधिकार नहीं मिले। अब संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण इसी सोच का हिस्सा है।
बिहार के अस्पतालों में खुल कर हो रही है दलाली
बिहार से चौंकाने वाली तस्वीरें आईं। बिहार के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार सीतामढ़ी में सरकारी अस्पताल पहुंचे। डॉक्टरों के सामने मरीजों के रिश्तेदारों ने मंत्री को बताया कि अस्पतालों में दलालों का नेटवर्क कैसे काम करता है, कैसे मरीजों को सरकारी अस्पताल से प्राइवेट अस्पताल में रेफर किया जाता है, कैसे प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों से इलाज के नाम पर वसूली होती है और इसमें दलाल का हिस्सा भी तय होता है। जब मंत्री सीतामढ़ी के सदर अस्पताल पहुंचे, तो वहां न डॉक्टर थे, न नर्सिंग स्टाफ, जिन लोगों की ड्यूटी थी, उनमें से ज्यादातर गायब थे। अस्पताल में न दवाएं थी, न साफ सफाई थी। 50 बेड्स के इस अस्पताल में 22 सरकारी डॉक्टर हैं लेकिन ज्यादातर डॉक्टर ड्यूटी से गायब रहते हैं।
निशांत कुमार ने एक मरीज को एंबुलेंस से मुजफ्फरपुर भेजने को कहा, मरीज के तीमारदारों को अपना मोबाइल नंबर दिया, कहा कि कोई दिक्कत हो तो वो सीधा उन्हें फोन करें। बिहार में अस्पतालों की खराब हालत कोई छुपी हुई बात नहीं है। भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में मरने वाले हर तीन व्यक्ति में से दो की मौत गलत इलाज या इलाज की कमी के कारण होती है। बिहार में सालाना करीब पांच लाख लोग इसी तरह मौत का शिकार हो जाते हैं। CAG की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों की इमारतें बना दी गईं, X-ray और ultrasound मशीनें भी लगा दी गईं, लेकिन technicians न होने से सब कुछ बर्बाद हो गया।
ग्रामीण इलाके के अस्पतालों में डाक्टर्स भेजे जाते हैं, लेकिन डाक्टर्स वहां जाना नहीं चाहते। बहुत सारे ऐसे केस मिले जब डाक्टर शहर में अपनी प्रैक्टिस करते हैं और गांव के अस्पताल में हाजिरी लगाते हैं। अब बिहार सरकार ने राज्य का स्वास्थ्य बजट बढ़ाकर 21 हजार 270 करोड़ रुपये कर दिया है। इस साल के आखिर तक 3200 नए स्वास्थ्य केंद्र खोलने का लक्ष्य है लेकिन जब तक डाक्टर्स, टैकनीशियन्स नहीं होंगे, ये सारी प्लानिंग बेकार हो जाएगी। इसीलिए अगर बिहार में अस्पतालों की हालत सुधारनी है तो बड़े स्तर पर सोचना होगा।
महाराष्ट्र में ऑटो, टैक्सी चालकों को मराठी सीखने के लिए टाइम दो
महाराष्ट्र में कल से ऑटो चालकों ने तीन दिन की हड़ताल शुरु कर दी। गैर-मराठी ऑटो, टैक्सी चालकों का कहना है कि उनके मराठी ज्ञान का ऑन द स्पॉट टेस्ट हो रहा है, इससे वो परेशान हैं, लड़ाई झगड़े हो रहे हैं, मारपीट हो रही है। जो उत्तर भारतीय लोग चालीस साल से मुंबई या महाराष्ट्र के दूसरे शहरों में ऑटो, टैक्सी चला रहे हैं, उनका कहना है कि बुढ़ापे में दूसरी भाषा सीखना मुश्किल है। कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर मराठी की कक्षा में जाएंगे तो ऑटो कब चलाएं, परिवार का पेट कैसे भरेगा। उनकी मांग है कि सरकार उन्हें तीन से छह महीनों का समय दे।
महाराष्ट्र में जो लोग तीन-तीन पीढ़ियों से रहे हैं, रोजगार कर रहे हैं, इसके बाद भी अगर उन्हें मराठी भाषा नहीं आती तो ये हैरानी की बात है। सरकार ने 60 दिन की मोहलत दी थी। कोचिंग क्लास का इंतजाम किया। 1 लाख 85 हजार auto drivers में से 1 लाख 65 हजार auto taxi drivers ने मराठी सीख ली है, जो 15 प्रतिशत बचे, अगर उन्हें और वक्त चाहिए तो सरकार वह भी देने को तैयार है। तो फिर दिक्कत क्या है? इस मामले में drivers की भावनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। वे भी महाराष्ट्र के हैं, उन्हें पराया नहीं समझना चाहिए।
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