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खुली आंखें रास्ते के कांटों को देखती हैं, यहां पढ़ें रामधारी सिंह दिनकर के प्रेरक विचार

रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी साहित्य के सबसे प्रमुख लेखकों में से एक थे। उनकी कविताओं में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है, वहीं दूसरी ओर बेहद कोमल भावनाएं भी देखने को मिलती हैं। उनके विचार लोगों को प्रेरिक करने का भी काम करते थे। ऐसे में यहां पढ़ें उनके प्रेरक विचार।

रामधारी सिंह दिनकर के प्रेरक विचार- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV रामधारी सिंह दिनकर के प्रेरक विचार

रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी साहित्य के सबसे महान और प्रभावशाली कवियों, लेखकों में से एक थे। उन्हें हिन्दी जगत में 'राष्ट्रकवि' के रूप में जाना जाता है। स्वतंत्रता से पहले उन्होंने अपनी कविताओं के ज़रिए देशभक्ति की आग जलाई और स्वतंत्रता के बाद आम जनता की आवाज़ बने। दिनकर जी मुख्य रूप से 'वीर रस' के कवि माने जाते हैं। उनकी कविताएं और बातें सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि वे सोए हुए आत्मसम्मान और साहस को जगाने का मंत्र थीं। दिनकर जी की बातों और कविताओं में लोगों को मोटिवेट करने की जो अद्भुत क्षमता थी। आज भी उनकी कविताएं लोगों को मोटिवेट करने का काम करती है। ऐसे में यहां पढ़ें रामधारी सिंह दिनकर के प्रेरक विचार। 

  • कोरा किताबी ज्ञान मनुष्य को धोखा भी दे सकता है, किन्तु संघर्षों से निकली हुई शिक्षा कभी भी झूठी नहीं होती।
  • खुली आंखें रास्ते के कांटों को देखती हैं, बंद आंखों से दूर का भी सत्य देखा जा सकता है।
  • सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है।
  • जिसके जीवन में तनाव नहीं है, कोई संघर्ष नहीं है, कर्मठता और उत्साह नहीं है, उसका कोई व्यक्तित्व भी नहीं है।
  • मनुष्य विरासत नहीं, योजना है। वह अतीत का बोझ ढ़ोने को नहीं, भविष्य के निर्माण के लिए जन्म लेता है।
  • उपयोगिता का धरातल वह धरातल है, जिस पर मनुष्य और पशु, दोनों सामान हैं।
  • जैसे सभी नदियां समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सभी गुण अंतत: स्वार्थ में विलीन हो जाते हैं।
  • अस्तमान सूर्य यानि डूबते सूरज को मत रुको। चीजें तुम्हें छोड़ने लगें, उससे पहले तुम्हीं उन्हें छोड़ दो।
  • जब किसी इंसान का बुरा समय आने वाला होता है, तब वह सबसे पहले अपनी बुद्धि का त्याग करके फैसला लेना शुरू करता है।
  • सतत चिंताशील व्यक्ति का कोई मित्र नहीं बनता।
  • अभिनंदन लेने से मना करना, उसे दोबारा मांगने की तैयारी है।
  • स्वार्थ हर तरह की भाषा बोलता है, हर तरह की भूमिका अदा करता है, यहां तक कि नि:स्वार्थता की भाषा भी नहीं छोड़ता।
  • विद्वानों और लेखकों के सामने सरलता सबसे बड़ी समस्या होती है। 
  • जैसे सभी नदियां समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सभी गुण अंतत: स्वार्थ में विलीन हो जाते हैं।

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